Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 93, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 93 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति मे भगवता पूर्वमुक्तं तदेतदद्य तुभ्यं कथितम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अनुसन्धान का
अनुसरण करनेवाला मन आकाश में भी महावन को देखकर उसको काटता है और काटकर
फिर उसमें वृक्ष लगाता हे । हे वत्स वसिष्ठ, इस प्रकार मन जिस इन्द्रजाल की रचना करता है,
उसीको शीघ्र देखता है यह जगत् न सत् है और न असत् हे, ऐसा जानकर विविध भेदों से
युक्त परिच्छिन्न दुष्टिका तुम परित्याग करो ॥३६, ३ ७॥
बानबेवाँ सर्ग समाप्त
= उनकी सृष्टि में आपकी सृष्टि में स्थित कुछ वस्तु न तो अनुकूल है और न प्रतिकूल है उसमें उनके
अनुसन्धानमात्र की अपेक्षा होती है, इसलिए प्रलयकाल में भी उसका विरोध नहीं है, यह भाव है ।
तिरानबेवाँ सर्ग
ब्रह्म से मन की उत्पत्ति, उससे तैजस ब्रह्मा की उत्पत्ति,
उससे मोहवश अहंकार की उत्पत्ति तथा उससे विश्वकी उत्पत्ति का वर्णन ।
पूर्वोक्ति मन:पूर्वक सृष्टिक्रम का विस्तार से प्रतिपादन करने की इच्छा करनेवाले
श्रीवसिष्ठजी ब्रह्मा के संवाद का उपसंहार करते हैं।
वत्स श्रीरामजी, भगवान् ब्रह्माजी ने यह सब मुझसे पहले कहा था, वही आज मैंने आपसे
कह दिया है