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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 39

अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त उनतालीसवाँ सर्ग सूर्य के अस्तसमय का, राक्षस ओर वेतालो से परिपूर्ण सन्ध्या का ओर रात्रि में अत्यन्त बीभत्स रणभूमि का वर्णन ।

11 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवशिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, तदुपरान्त अस्त्र-शस्त्रो के तेज से जिसका पराक्रम म…
  2. Verse 2पहले आकाशरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित रणभूमि के रुधिर की कान्ति ने सूर्यरूप अश्वारोही का स…
  3. Verses 3–4पृथिवी, पाताल, आकाश ओर दशों दिशाओं से प्रलयकाल के समुद्र की जलराशि के तुल्य वेताल आये, जो…
  4. Verse 5जैसे प्राणरहित, मोह से अन्धकारमय ओर जीवनावस्था में जीवन से प्रेम करनेवाले मृतकों के हृदयो…
  5. Verse 6जिनके पंख देह से सटे थे ओर जो क्लेश से ऊपर को अपनी गर्दन किये थे, ऐसे पक्षीगण मृत योद्धाओ…
  6. Verses 7–8जैसे वीरों के पक्ष में विजयलक्ष्मी का हृदय खिल जाता है, वैसे ही समीपवर्ती चन्द्रमा के सुन…
  7. Verse 9ऊपर आकाशरूपी तालाब तारारूपी कुमुदों से (कुँईयों से) विभूषित हुआ और नीचे का जलतालाब कुमुदर…
  8. Verses 10–19जैसे बाँध से रहित जल चारों ओर फैल जाता है, वैसे ही अन्धकार मेँ पहले बिछुड़े हुए फिर मिलने…
  9. Verses 20–28मूर्तिमती ज्वालाओं से युक्त-सी प्रतीत हो रही थी | रुधिर के मारे उछलकर भूमि में गिर रहे वे…
  10. Verse 29वहाँ पर वेतालो के बालक कबन्धो के कटे हुए कन्धों में क्रीडा-व्यग्र थे । यक्ष, राक्षस, पिशा…
  11. Verse 30वहाँ पर आकाश, पर्वतों के निकुज ओर गुफाओं के मध्य में पिण्ड के समान घने तमोरूप मेघो का समू…