Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, Verses 10–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, verses 10–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 10-19
संस्कृत श्लोक
तमस्यपेतभीतानि भूतानि मिलितान्यलम् ।
पयांसीव विसेतूनि प्रसृतानि दिशं प्रति ॥ १० ॥
आसीद्रणाङ्गणं गायद्वेतालकुलसंकुलम् ।
क्वणत्कङ्कालकाङ्कस्थकङ्ककाकोलकेलिमत् ॥ ११ ॥
अथ काष्ठचिताज्वालसताराम्बरभास्वरम् ।
पचत्पचपचाशब्दिमेदोमांसमयानलम् ॥ १२ ॥
सर्वाङ्गास्थिस्फुटास्फोटस्फुटच्चितिचयोन्मुखम् ।
वेतालललनारब्धजललीलातिरोहितम् ॥ १३ ॥
श्वकाकयक्षवेतालतालकोलाहलोल्बणम् ।
गमागमेन भूतानां समुड्डीनवनोपमम् ॥ १४ ॥
रक्तमांसवसामेदोहरणव्यग्रडाकिनि ।
चर्वितासृग्वसामांसस्रवत्सृक्किपिशाचकम् ॥ १५ ॥
मध्यमध्यचितालोकप्रकटासृक्शवव्रजम् ।
विरूपिकानीयमानस्वांसन्यस्तमहाशवम् ॥ १६ ॥
उत्ताण्डवोग्रकुम्भाण्डमण्डलोड्डामरोदरम् ।
छमिच्छमित्प्रलापान्तं मेदोसृग्वाष्पसाम्बुदम् ॥ १७ ॥
वहद्रक्तनदीरंहोरूढभूचररूपिकम् ।
वेतालकुलकङ्कालकर्षणाकुलकाकलम् ॥ १८ ॥
मृतेभोदरमञ्जूषासुप्तवेतालबालकम् ।
विविक्तैकरणोद्देशपानक्रीडास्थराक्षसम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बाँध से रहित जल चारों ओर फैल जाता है, वैसे ही
अन्धकार मेँ पहले बिछुड़े हुए फिर मिलने पर भी पहिचान न सकने के कारण एक दूसरे से डरे
हुए जीव चारों ओर भागते थे । गा रहे वेतालों के झुण्ड से रणस्थली परिपूर्ण थी और उसमें
जहाँ-तहाँ नर कंकालों के अंक में बैठे हुए और बस रहे सफेद चील और कौए अठखेलियाँ
करते थे। रणभूमि में काष्ठ की अनेक चिताएँ जल रही थी, उनकी ज्वालाओं से युक्त वह
तारागणों से परिवेष्टित आकाशमण्डल के समान दमक रही थी, वहाँ पर पक रहे तथा पच-
पच शब्द कर रहे मेदा और मांस से पूर्ण अग्नि थी, सर्वांग की हड्डियों के टूटने से शब्द करती
हुई अनेक चिताएँ वीरों की नाईं प्रधानरूप से प्रकाशमान थी, वेतालों की स्त्रियाँ जल-क्रीड़ाओं
की तरह चिताओं में छिर रही थी । वह कुत्ते, कौए, यक्ष और वेतालो के कर्णकट् कोलाहलों से
भीषण थी, प्राणियों के गसन और आगमन से उड़ते हुए वनों की तरह थी, डाकिनियाँ वहाँ पर
रूधिर, मांस, चर्बी, और मेदा के हरण में व्यग्र थी । वहाँ पर पिशाचों ने जो मांस खाया था, वह
उनके ओठों से गिर रहा था, बीच-बीच की चिताओं में पिशाचों द्वारा खून से भरे हुए शव देखे
जा रहे थे, पूतनाएँ अपनी गोद में बड़े-बड़े शवों को ले जा रही थी। वहाँ पर उद्धत नृत्य में उग्र
कुष्माण्डों के (ऊँचे पेटवाले पिशाचों के) मण्डल के बड़े-बड़े उदर थे, शवों के मुख के पास
प्रलाप की नाई 'छम-छम'* ज्वाला के शब्द हो रहे थे, मेदा और रुधिर के गले धुएँ से वह
रणभूमि मेघयुक्त सी थी । वहाँ पर रूपिका (एक प्रकार की पूतना) बह रही रुधिर नदी के वेग
में जमकर खड़ी हुई अतएव भूचरी सी मालूम पड़ रही थी। वहाँ पर नाना प्रकार के वेताल
शवपिंजरों को खींचने में अपने कुल के अनुरूप किलकारियाँ भर रहे थे । मरे हुए हाथियों के
उदररूप पालने में वेतालों के बालक सो रहे थे। एकान्त रण-प्रदेश में राक्षस अपनी पानक्रीड़ा
में व्यस्त थे