Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
आसन्नचन्द्रसुभगा लोकाः कुसुमपङ्क्तयः ।
उल्लसद्धृदया जाता वीरपक्षेष्विव श्रियः ॥ ७ ॥
रक्तवारिमयी सायमङ्गगुप्तशिलीमुखा ।
संकुचद्वक्त्रपद्माभूद्रणभूमिरिवाब्जिनी ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वीरों के पक्ष में विजयलक्ष्मी
का हृदय खिल जाता है, वैसे ही समीपवर्ती चन्द्रमा के सुन्दर आलोक (चाँदनी) से युक्त
कुमुद आदि फूलों का हृदय खिल उठा । जैसे रणभूमि रुधिर रूपी जल से परिपूर्ण होती है,
उसमें योद्धाओं के अंगों में बाण छिपे रहते हैं और मुखरूपी कमल म्लान रहते हैं, वैसे ही
कमलों के तालाब सन्ध्या की लालिमा के प्रतिबिम्बित होने से लाल जल से भरे थे, कमलो में
भँवरे बन्द थे और उनके मुख के तुल्य कमल संकुचित हो गये थे