Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 3 , 4
संस्कृत श्लोक
भूपातालनभोदिग्भ्यः प्रलयब्धिजलौघवत् ।
समाजग्मुस्तनत्ताला वेताला वलया इव ॥ ३ ॥
मृष्टध्वान्तासिवलिते दिननागेन्द्रमस्तके ।
संध्यारागारुणं कीर्णं तारानिकरमौक्तिकम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
पृथिवी, पाताल,
आकाश ओर दशों दिशाओं से प्रलयकाल के समुद्र की जलराशि के तुल्य वेताल आये, जो
सम्पूर्ण दिशाओं का परिवेष्टन करने से वलयाकार प्रतीत होते थे ओर खूब करताल बजा रहे
थे । सान में रखकर खूब तेज की गई अन्धकाररूपी तलवार से दिनरूपी गजराज का मस्तक
काटने पर सन्ध्यारागरूपी रुधिर से लाल तारामण्डलरूपी गजमौक्तिक बिखर पड़े