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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, Verses 20–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 39, verses 20–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 20-28

संस्कृत श्लोक

मत्तवेतालकलहचितालातरणोज्ज्वलम् । वहद्रक्तवसामिश्रगन्धबन्धुरमारुतम् ॥ २० ॥ रूपिकापेटिकावान्तारणद्रटरटारवम् । अर्धपक्वशवास्वादलुब्धयक्षोल्लसत्कलि ॥ २१ ॥ तुङ्गवङ्गकलिङ्गाङ्गतङ्गणाङ्गलगत्खगम् । तारापातोपमहसत्संमुखज्वालरूपिकम् ॥ २२ ॥ पतद्वेतालसोल्लासमध्यस्थासृग्विरूपिकम् । पिशाचाकर्णिताभ्यर्णयोगिनीगणनायकम् ॥ २३ ॥ प्रसृतान्त्रमहातन्त्रीप्रायसंपन्नवादनम् । पिशाचवासनोत्क्रान्तपिशाचीभूतमानवम् ॥ २४ ॥ रूपिकालोकनापूर्वत्रासार्धमृतसद्भटम् । क्वचिद्वेतालरक्षोभिरपरीपूर्णमद्रकम् ॥ २५ ॥ स्वरूपिकास्कन्धपतच्छवत्रस्तनिशाचरम् । नभःसंघट्टितापूर्वभूतपेटकसंकटम् ॥ २६ ॥ अतिप्रयत्नापहृतम्रियमाणनरामिषम् । स्वभक्ष्यापेक्षपक्षेषु विक्षिप्तशवराशिवत् ॥ २७ ॥ शिवामुखानलशिखाखण्डोत्थमितिरक्तगैः । समुड्डीननवाशोकपुष्पगुच्छमिवाभितः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

मूर्तिमती ज्वालाओं से युक्त-सी प्रतीत हो रही थी | रुधिर के मारे उछलकर भूमि में गिर रहे वेतालो के बीच में खून पीनेवाली पूतनाएँ परिहास कर रही थी । वहाँ पर योगिनीगण के नायक पिशाचो द्वारा आहत होकर समीप में आ रहे थे, चारों ओर बिखरी हुई ओंतडीरूपी महावीणाओं द्वारा वादन किया जा रहा था । वहाँ पर पिशाचो की वासना से पिशाच बने हुए मनुष्य उछल कूद रहे थे, पूतना के दर्शन से जनित अपूर्वं भय से अच्छे-अच्छे योद्धा मृतप्राय हो रहे थे, कहीं पर वेतालो ओर राक्षसो के आनन्दोत्सव मनाये जा रहे थे, पूतनाओं के कन्धों से गिरे शवों से निशाचर भी भयभीत हो रहे थे, आकाशसे टकरानेवाले अपूर्व भूतो के पिटारों से सारी रणभूमि व्याप्त थी । वहाँ मर रहे मनुष्य के मांस को बड़े प्रयत्न से छीन रहे थे, भक्ष्यकी अपेक्षा रखनेवाले अपने पक्षों में वहाँ पर शवों की राशि बिखेरी गई थी | लोमड़ियों के मुख से निकली हुई अग्नि की ज्वालाओं से पूर्ण संज्ञा को प्राप्त हुए ओर खून से लथपथ पुरूषों से चारों ओर रणभूमि ऐसी प्रतीत होती थी, मानों नये-नये अशोक-पुष्पों के गुच्छे उड रहे हों