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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 13

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग बरह्म के जीवभाव तथा देह आदि की प्राप्ति का वर्णन ।

10 verse-groups

  1. Verses 1–4जैसे युषुप्ति अवस्था में जीवप्रयोजक उपाधियों का (अन्तःकरण आदि का) विनाश होने से वे मायाशब…
  2. Verses 5–12मिट्टी, जल, प्रकाश, वायु आदि किसीकी भी आवश्यकता नहीं है । भाव यह कि अन्यान्य बीजों को उगन…
  3. Verses 13–17शंका - ब्रह्म में अध्यस्त पंचभूततन्मात्राओ की ब्रह्ममात्रता भले ही हो, पर उनके कार्य जगत्…
  4. Verses 18–20ब्रह्म के 'जीवोष्हम्‌” इस प्रकार के साधारण अभिमानसे समष्टिजीवभावको कहकर अब विशेष अभिमान स…
  5. Verses 21–22स्वप्न में अपने मरणज्ञान के समान एक ही वह चिदात्मा द्वितीयता को प्राप्त होता है, पूर्वोक्…
  6. Verses 23–42यह लिंगदेहज्ञान और भावी स्थूलदेहज्ञान चित्तकल्पना से ही होता है, ऐसा कहते हैँ । जैसे स्वप…
  7. Verse 43तब जगत्‌ को अद्वृष्ट संस्कार आदि सामग्रीसे उत्पन्न हुआ क्यों न माना जाय ? इस शंका पर कहते…
  8. Verses 44–52व्यावर्त्य न होने से एकत्व संख्यासे भी रहित ब्रह्मरूप ही है । यद्यपि जगत की भ्रान्ति होती…
  9. Verse 53जैसे स्वप्न में प्रतीत हुआ असत्‌ अपना मरण जाग्रत में बाधित हो जाता है, वैसे ही अज्ञानावस्…
  10. Verse 54सिहावलोकन न्याय से पूर्वोक्ति सम्पूर्ण विषय का पुनः संक्षेप से निरूपण कर उपसंहार करते हैं…