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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 18–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 18-20

संस्कृत श्लोक

जीवाकाशस्त्विमं देहं यथा विन्दति तच्छ्रुणु । जीवाकाशः स्वमेवासौ तस्मिंस्तु परमेश्वरे ॥ १८ ॥ अणुतेजःकणोऽस्मीति स्वयं चेतति चिन्तया । यत्तदेवोच्छूनमिव भावयत्यात्मनाम्बरे ॥ १९ ॥ असदेव सदाकारं संकल्पेन्दुर्यथा न सन् । तमेव भावयन् द्रष्ट्रदृश्यरूपतया स्थितः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म के 'जीवोष्हम्‌” इस प्रकार के साधारण अभिमानसे समष्टिजीवभावको कहकर अब विशेष अभिमान से व्यष्टिजीवभाव द्वारा स्थूलदेहपर्यन्त तादात्म्य के आरोप के क्रम का विस्तार से प्रतिपादन करने के लिए कहते हैं । वत्स, जीवाकाश जिस प्रकार से इस देह को प्राप्त होता है, उस प्रकार को अब आप मुझसे सुनिए । चिदात्मा परमेश्वरमें कल्पित समष्टिजीवाकाश अतिविस्तृत होता हुआ भी मैं चिनगारी की नाई अत्यन्त सूक्ष्म तेज का कण हूँ, इस प्रकार भावना करने से वैसा ही (अणुरूप ही) अपने को जानता है । इसी अभिप्राय से श्रुति ने कहा है - "यथा अग्नैः क्षुद्रा विस्फुल्लिंगा व्युच्चरन्तयेवमेवास्मादात्मनः सर्व एत आत्मानो व्युच्चरन्ति (जैसे अग्नि से छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही इस आत्मा से ये सब जीव आविर्भूत होते हैँ) । आकाश में आत्मरूप से जिस स्थूलता का चिन्तन करता है, भावना द्वारा तद्रूप ही अपने को स्थूलरूप- सा समझता है । जैसे संकल्प से कल्पित चन्द्रमा सत्‌ नहीं है, वैसे ही जिसकी भावना करता है, वह स्वरूप सत्‌ नहीं है, फिर भी सत्‌-सा प्रतीत होता है, उसीकी भावना करने से यह द्रष्टा-दुश्यरूप से स्थित है