Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
विनश्यत्यसदेवान्ते स्वप्ने स्वमरणं यथा ।
अथवा स्वस्वरूपत्वात्सदेवेदमनामयम् ।
अखण्डितमनाद्यन्तं ज्ञानमात्राम्बरोदरम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में प्रतीत हुआ असत् अपना मरण जाग्रत में बाधित हो जाता है, वैसे ही
अज्ञानावस्था में प्रतीयमान यह दृश्य प्रपंच ज्ञान होने पर बाधित हो जाता है।
पूर्वोक्त रीति से अपवादद्गष्टि द्वारा स्वरूपतः जगत् की असत्ता का प्रतिपादन किया गया
है, अव अधिष्ठानद्रष्टि से भी उसकी असत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।
अथवा ब्रह्मस्वरूप होने के कारण यह दृश्य प्रपंच निर्मल, परिपूर्ण, अद्वितीय, आदि और
अन्त से शून्य चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म ही है उससे अतिरिक्त इसकी सत्ता ही नहीं है