Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 44–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verses 44–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 44-52
संस्कृत श्लोक
अनाद्यनुभवस्त्वित्थं योऽत्रास्ति वनिकादिके ।
स्वप्नानुभूतं पृथ्व्यादि प्रबोधे यादृशं भवेत् ॥ ४४ ॥
स्मृतः स व्योममात्रात्मा सर्वदैव स्मृतं जगत् ।
यत्र यत्र यथा तोये द्रवत्वं नाम भिद्यते ॥ ४५ ॥
तत्र तत्र तथा नान्यः सर्गोऽस्ति परमात्मनि ।
सृष्टिरेवमियं प्रौढा सम एव त्वयं स्थितः ॥ ४६ ॥
भात्येवं नाम ब्रह्माण्डं व्योमात्मेवातिनिर्मलम् ।
दृश्यमेवमिदं शान्तं स्वात्मनिर्मितविभ्रमम् ॥ ४७ ॥
निराधारं निराधेयमद्वैतं चैक्यवर्जितम् ।
जगत्संविदि जातायामपि जातं न किंचन ॥ ४८ ॥
परमाकाशमाशून्यमच्छमेव व्यवस्थितम् ।
सर्वसंसारता नास्ति यदेव तदवस्थितम् ॥ ४९ ॥
नाधेयं तत्र नाधारो न दृश्यं न च द्रष्टृता ।
ब्रह्माण्डं नास्ति न ब्रह्मा न च वैतण्डिका क्वचित् ॥ ५० ॥
न जगन्नापि जगती शान्तमेवाखिलं स्थितम् ।
ब्रह्मैव कचति स्वच्छमित्थमात्मात्मनात्मनि ॥ ५१ ॥
चित्त्वाद्द्रवत्वात्सलिलमिवावर्ततयात्मनि ।
असदेवेदमाभाति सदिवेहानुभूयते ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यावर्त्य न होने से एकत्व संख्यासे भी रहित ब्रह्मरूप ही है । यद्यपि जगत की भ्रान्ति होती है
फिर भी उत्पन्न कुछ नहीं हुआ हे । चारों ओर से शून्य, निर्मल चिदाकाश ही स्वरूप से स्थित
है, न उसमें सम्पूर्ण संसार है, उसका कोई आधार है, न कोई उसका आधेय है, न दृश्य है,
न द्रष्ट्त्व है, न ब्रह्माण्ड है, न ब्रह्मा है ओर न कहीं मदान्ध मोहान्ध जलरूपी गजघटा है। न
जगत् है और न पृथिवी हे । यह सम्पूर्ण दृश्य निर्मल ब्रह्म ही है । उक्त चिदात्मा ब्रह्म अपने में
अपने से स्वयं विकास को प्राप्त होता है । तरल होने के कारण जैसे जल ही अपने में आवर्तरूप
से प्रतीत होता है, आवर्तं (भवर) कोई पृथक् पदार्थ नहीं है, वसे ही चिद्रूप होने के कारण
आत्मा में आत्मा ही जगत्-सा प्रतीत होता है, जगत् कोई पृथक् पदार्थ नहीं है, यों यह असत्
होता हुआ भी भ्रान्तिवश सत्-सा प्रतीत होता हे