Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 5–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verses 5–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 5-12
संस्कृत श्लोक
उच्छूनादन्यतन्मात्रभावनाद्भूतरूपिणः ।
अयमित्थं महागुल्मो जगदादिर्विलोक्यते ॥ ५ ॥
झटित्येवं क्रमेणेति स्वप्ने पुरमिवाकृतम् ।
महाकाशमहाटव्यामुद्भूयोद्भूय नश्यति ॥ ६ ॥
जगत्करञ्जकुञ्जानां बीजमेतदवापजम् ।
नापेक्षते किंचिदपि क्षितिवार्यनलादिकम् ॥ ७ ॥
एतच्चिदात्मकं पश्चात्किलोर्व्यादि करिष्यति ।
स्वं स्वप्नवित्पुरमिव चिन्मात्रात्मकमेव यत् ॥ ८ ॥
जगदाद्यङ्कुरं यत्र तत्रस्थमपि मुञ्चति ।
जगतः पञ्चकं बीजं पञ्चकस्य चिदव्यया ॥ ९ ॥
यद्बीजं तत्फलं विद्धि तस्माद्ब्रह्ममयं जगत् ।
एवमेष महाकाशे सर्गादौ पञ्चको गणः ॥ १० ॥
चिच्छक्त्या स्वाङ्गभूतात्मा कल्पितोस्ति न वास्तवः ।
अनेनोच्छूनतामेत्य यदपीदं वितन्यते ॥ ११ ॥
तदप्याकाशरूपात्मकल्पनात्मनि सन्मयम् ।
क्वचिन्न नाम तत्सिद्धं यदसिद्धेन साध्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
मिट्टी, जल, प्रकाश, वायु आदि किसीकी भी आवश्यकता नहीं है । भाव यह कि अन्यान्य
बीजों को उगने के लिए भूमि, जल, सूर्यताप आदि की आवश्यकता होती है, पर यह उनसे
विलक्षण है, इसे किसीकी भी आवश्यकता नहीं हे, ओर यह बोये विना ही उगता हे ।
तदनन्तर जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष अपने से अनुभूयमान नगर को उत्पन्न करता हे,
वैसे ही यह चिदात्मा भी पृथिवी आदिकी उत्पत्ति करता है । वस्तुतः स्वरूप से तो असंग
चिदात्मक ही रहता है, वह जहाँ कहीं पर भी स्थित हो, जगद्रूषी अंकुर का त्याग करता ही
है (जगद्रूप अंकुर को उत्पन्न करता है) । पंचभूत तन्मात्रा जगत् की बीज हैं और
पंचतन्मात्राओं का बीज अविनाशी चिदात्मा हे । जो बीज है, वही फल होता है, (क्योकि
कार्य ओर कारणका अभेद है) । इसलिए श्रीरामचन्द्रजी, आप जगत् को ब्रह्मरूप जानिये ।
इस प्रकार सृष्टि के आरम्भमें ये पंचभूततन्मात्राएँ, जो कि चिदात्मा की विषयप्रकाशनशक््ति
से स्वस्वरूपभूता है, महाकाश में कल्पित हैं, वास्तविक नहीं है । यद्यपि ये ही पंचभूततन्मात्राएँ
परस्पर संमिश्रण से स्थूलता को प्राप्त होकर इस सम्पूर्णं स्थूल प्रपंच का विस्तार करती
है, तथापि ये आकाशम प्रतीयमान रूप की भोति अपनी कल्पना के अधिष्ठान चिदात्मा में
स्थित होने के कारण ही सत् हैं, स्वतः सत् नहीं है, क्योकि जिसका असिद्ध पदार्थ से
साधन किया जाता है, वह कभी सिद्ध नहीं होता, यह निश्चित है | जो स्वरूप काल्पनिक
है यानी वास्तविक नहीं है, वह कैसे सत्य हो सकता है