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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 23–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verses 23–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 23-42

संस्कृत श्लोक

चित्तात्प्रत्ययमाधत्ते स्वप्ने स्वामिव पान्थताम् । तारकाकारमाकारं भाविदेहाभिधं तथा ॥ २३ ॥ भावयत्येति तद्भावं चित्तं चेत्यार्थतामिव । परित्यज्यैव तद्बाह्यं ततस्तारककोटरे ॥ २४ ॥ अन्तर्भाति बहिष्ठोऽपि पर्वतो मुकुरे यथा । कूपसंस्थो यथा देहः समुद्गकगतं वचः ॥ २५ ॥ स्वप्नसंकल्पयोः संविद्वेत्त्येतज्जीवकोऽणुके । स्वरूपतारकान्तस्थो जीवोऽयं चेतति स्वयम् ॥ २६ ॥ तदेतद्बुद्धिचित्तादिज्ञानसत्तादिरूपकम् । जीवाकाशः स्वतस्तत्र तारकाकाशकोशगम् ॥ २७ ॥ प्रेक्षेऽहमिति भावेन द्रष्टुं प्रसरतीव खे । ततो रन्ध्रद्वयेनैव भाविबाह्याभिधं पुनः ॥ २८ ॥ येन पश्यति तन्नेत्रयुगं नाम्ना भविष्यति । येन स्पृशति सा वै त्वग्यच्छृणोति श्रुतिस्तु सा ॥ २९ ॥ येन जिघ्रति तद्घ्राणं स स्वमात्मनि पश्यति । तत्तस्य स्वदनं पश्चाद्रसना चोल्लसिष्यति ॥ ३० ॥ स्पन्दते यत्स तद्वायुश्चेष्टा कर्मेन्द्रियव्रजम् । रूपालोकमनस्कारजातमित्यपि भावयत् ॥ ३१ ॥ आतिवाहिकदेहात्मा तिष्ठत्यम्बरमम्बरे । एवमुच्छूनतां तस्मिन्भावयंस्तेजसः कणे ॥ ३२ ॥ असत्यां सत्यसंकाशां ब्रह्मास्ते जीवशब्दवत् । इत्थं स जीवशब्दार्थः कलनाकुलतां गतः ॥ ३३ ॥ आतिवाहिकदेहात्मा चित्तदेहाम्बराकृतिः । स्वकल्पनान्त आकारमण्डं संस्थं प्रपश्यति ॥ ३४ ॥ कश्चिज्जलगतं वेत्ति कश्चित्सम्राट्स्वरूपिणम् । भाविब्रह्माण्डकलनां पश्यत्यनुभवत्यपि ॥ ३५ ॥ आत्मगर्भगृहं चित्ताद्यथासंकल्पमात्मनः । देशकालक्रियाद्रव्यकल्पनावेदनं स तत् ॥ ३६ ॥ भावयञ्छब्दनिर्माता शब्दैर्बध्नाति कल्पितैः । आतिवाहिकदेहोऽसावित्यसत्यजगद्भ्रमे ॥ ३७ ॥ असत्य एव कचति स्वप्ने खोड्डयनं यथा । इत्यनुत्पन्न एवासौ स्वयंभूः स्वयमुत्थितः ॥ ३८ ॥ आतिवाहिकदेहात्मा प्रभुराद्यः प्रजापतिः । एतस्मिन्नपि संपन्ने ब्रह्माण्डाकारिणि भ्रमे ॥ ३९ ॥ न किंचिदपि संपन्नं न च जातं न दृश्यते । तद्ब्रह्माकाशमाकाशमेव स्थितमनन्तकम् ॥ ४० ॥ संकल्पनगराकारमेतत्सदपि नैव सत् । अनिर्मितमरागं च एतद्वै चित्रमुत्थितम् ॥ ४१ ॥ अकृतं चानुभूतं च न सत्यं सत्यवत्स्थितम् । महाकल्पे विमुक्तत्वाद्ब्रह्मादीनामसंशयम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह लिंगदेहज्ञान और भावी स्थूलदेहज्ञान चित्तकल्पना से ही होता है, ऐसा कहते हैँ । जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न मेँ पथिक बन जाता है, वैसे ही वह चित्त की कल्पना से मैं लिंगदेहाकार और भावी स्थूलदेहाकार हूँ, इस ज्ञान को धारण करता है । जैसे चित्त विषयाकारता को प्राप्त होता हे यानी स्वप्न ओर मनोरथमे बाहर स्थित भी विषय बाह्यरूप का त्याग कर भीतर अन्तःकरणात्मना प्रतीत होता हे, वैसे ही भावना करता हुआ यह चिदात्मा तद्रूपता को प्राप्त होता है, तदुपरान्त उपाधि से भीतर कल्पित आकाश में अपने स्वाभाविक रूप का त्याग करके बाह्य रूपता को प्राप्त करता हे । जैसे बाहर स्थित भी, पर्वत दर्पण में भीतर स्थित-सा प्रतीत होता है, जैसे सर्वत्र व्यवहार करने में (यातायात में) समर्थ शरीर कूपजलमें प्रतिबिम्बित होकर कूपमें ही व्यवहार करनेवाला प्रतीत होता है, जैसे दूर से सुनने के योग्य गुहास्थित दीर्घशब्द गुहा आदि में ही स्थित रहता है, बाहर नही निकलता, जैसे स्वप्न और मनोरथमें संवित्‌ देह में ही स्वप्न आदि देखती है, वैसे ही पूर्वोक्त स्फुल्लिंगसद्श उपाधि में स्वरूप से कल्पित तारका में स्थित चिदात्मा वासनामय देहादिका अनुभव करता है । तारकाकाशरूपी कोश में स्थित यह वासनामय देह आदि व्यवहारदुष्टि से विचार करनेपर बुद्धि, चित्त आदि रूप ही है, क्योकि वह बुद्धि, चित्त आदि का परिणाम है ओर परमार्थदृष्टि से विचार करने पर तो वह ज्ञान, सत्ता ओर आनन्दरूप ही है । तदुपरान्त जीव “मेँ देखूँ” इस भावना से आकाशम विस्तार को प्राप्त होता है । जिन दो छिद्रों से वह भावी विषयों को देखता है उसका नाम नेत्र पडता है, जिससे विषयों को छूता है वह त्वचा नाम से विख्यात होती हे, जिससे शब्दादि विषयों को सुनता है उसका नाम कान होता है ओर जिससे गन्ध आदि को सूँघता हे वह नाक कहलाता हे । वह अपने में अपने को देखता है (अनुभव करता है) । उसकी जो रसनेन्द्रिय हे, वह पीछे जीभ नामसे प्रसिद्ध होती हे, जिससे श्वासप्रश्वास आदि क्रिया होती है वह वायु उसके प्राण, अपान आदि से प्रसिद्ध होता है, उसकी जो चेष्टाएँ हैं वे कर्मेन्द्रियाँ होती हें । इस प्रकार बाह्य विषयों ओर मानसिक विषयों की भावना कर रहा मनोमय शरीरधारी अतिसूक्ष्म जीव आकाशम स्थित रहता हे । पूर्वोक्त प्रणाली से उक्त तेज के कण में स्थूलता का अध्यास करता हुआ ब्रह्म ही जीवनामधारी होता हे । यों जीवशब्द का अर्थभूत हुआ वह चिदात्मा ही विविध कल्पनाओं से, जो असत्य होती हुई भी सत्य-सी प्रतीत होती हैं, पूर्ण हो गया है । मनोमय शरीर ब्रह्म ही स्थूलदेहाकार ([-}) बनकर यानी चिनगारी के आकार से लेकर बाह्य स्थूल विषयाकार पर्यन्त, जो स्वयं रचना की, तद्रूप बनकर अपनी रचना के अन्त में आवरण आदि से युक्त ब्रह्माण्ड को देखता है कोई जीव जल के मध्य में स्थित ब्रह्माण्ड में “अहम्‌” भावका ज्ञान होने से ब्रह्माण्ड को जानता है और कोई ब्रह्माण्ड के मध्यवर्ती ब्रह्मा के शरीर में “अहम्‌ ' भावना का ज्ञान होने से ब्रह्मा को जानता है । भाव यह कि चिनगारी से लेकर बाह्य स्थूल विषयाकार पर्यन्त स्वकल्पना को अपने संकल्पानुसार कोई ब्रह्माण्डरूप से जानता है ओर कोई हिरण्यगर्भरूप से | तदनन्तर आगे होनेवाले ब्रह्माण्ड की कल्पना को भी देखता है ओर उसका अनुभव भी करता है । मनोमय शरीरधारी जीव मन को ही आत्मा समझता हे । अतएव आत्मरूप मन से अपने संकल्प के अनुसार गर्भरूपी घर (गर्भवासनिमित्त होने से गर्भगृह), देश, काल, कर्म, द्रव्य आदि कल्पनाओं की भावना करता हुआ नाम आदि का निर्माता मनोमय देहधारी वह ईश्वर ही स्वकल्पित तत्‌ तत्‌ नामों से पदार्थो को ओर अपने को भी असत्य जगद्भममें बोधिता हे । भाव यह कि जीवभावापन्न ईश्वर ही मन से देश, काल आदि विविध पदार्थो की कल्पना कर देश, काल आदि नामों की सृष्टि करता है ओर उन नामों से उन पदार्थो का सम्बन्ध स्थापित कर उनको और अपने को जगद्रूप भ्रम में बाँधता है । जैसे स्वप्न में आकाश में उडना असत्य है, वैसे ही मनोमय देहधारी परमात्मा पूर्वोक्त असत्य जगद्रूप भ्रममें मिथ्या ही विकासको प्राप्त होता है । इस प्रकार पूर्व मेँ उत्पन्न न हुआ ही यह मनोमय देहधारी प्रजापति आदि स्वयम्भू उदित हुआ है । इस ब्रह्माण्डाकार भ्रम के होने पर भी कुछ भी नहीं हुआ हे, कुछ भी पैदा नहीं हुआ है और न कुछ दिखाई ही देता है । केवल निर्मल अनन्त ब्रह्माकाश ही है । मनोरथ से कल्पित नगर के तुल्य यह जगत्प्रपंच सत्‌-सा प्रतीत होता हुआ भी सत्‌ नहीं है । स्वयं उदित हुआ यह प्रपंच उस चित्र के सदृश हे, जिसकी न तो किसी चितेरे ने तुलिका आदि बाहरी सामग्रीसे रचना की, न जिसमें विविध रंग भरे, न मानसिक (=¬ चित्तदेहाम्बराकृत्तिः = जिसका सूक्ष्म मनोमय शरीर स्थूलता से स्थूल देहाकार बन गया है, वह है -चित्तदेहाम्बराकृति । प्रयत्न से ही जिसका निर्माण हुआ, न किसीको अनुभव ही हुआ और जो न सत्य ही हो, फिर भी सत्य सा प्रतीत होता हो