Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, Verses 13–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 13, verses 13–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 13-17
संस्कृत श्लोक
स्वरूपं यद्विकल्पात्म कथं तत्सत्यतामियात् ।
अथ चेत्पञ्चकं ब्रह्म ब्रह्मात्मकतया धिया ॥ १३ ॥
तत्पञ्चकं विद्धि प्रौढो ब्रह्मैव त्रिजगत्क्रमः ।
यथा स्फुरति सर्गादावेष पञ्चकसंभवः ॥ १४ ॥
तथैवाद्येह भूतत्वे याति कारणतां स्वयम् ।
\\xa0एवं न जायते किंचिज्जगज्जातं न लक्ष्यते ॥ १५ ॥
स्वप्नसंकल्पपुरवदसत्सदनुभूयते ।
\\xa0ब्रह्माकाशपराकाशे जीवाकाशत्वमात्मनि ॥ १६ ॥
इति चित्यवदातात्मा पृथ्व्यादीनामसंभवात् ।
\\xa0इत्येष जीवः कथितो व्योम्नि स्वात्मा इवोदितः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका - ब्रह्म में अध्यस्त पंचभूततन्मात्राओ की ब्रह्ममात्रता भले ही हो, पर उनके कार्य
जगत् की ब्रह्ममात्रता कैसे ?
समाधान - यदि “ये ब्रह्मस्वरूप हैं” इस बुद्धि से पंचभूततन्मात्राएँ ब्रह्मस्वरूपा हैं, तो
पंचतन्मात्राओं के कार्य स्थूल पांच महाभूत भी ब्रह्म ही हैं, उससे अतिरिक्त नहीं, क्योकि
कार्य ओर कारण की एकता दिनके समान प्रसिद्ध है । इससे यह सिद्ध हुआ कि चिरकाल से
बद्धमूल तीनों जगत् ब्रह्म ही हैं।
शंका - यदि उनमें भेद नहीं है, तो अभिन्न पदाभि कार्यकारणभाव का व्यवहार कैसे
होता है ?
समाधान - जैसे सृष्टि के पूर्व मे ये कारणभूत पंचतन्मात्राएँ स्वरूपभूत स्थूल प्रपंच के
प्रति कारणरूप से स्फुरित होती हैं, वैसे ही आज भी वे आगे होनेवाले अपने स्वरूप के प्रति ही
कारण होती हैं, अतः उनमें कार्यकारणभावका व्यवहार होता हे ।
इस प्रकार यह जगत् न कभी उत्पन्न होता है और न उत्पन्न हुआ दिखाई देता है। जैसे
संकल्प ओर मनोरथ द्वारा निर्मित नगर असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता है, वैसे ही
ब्रह्माकाशरूपी परमप्रकाश आत्मा में जीवाकाशत्व असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होता
है। वस्तुतः चिदात्मा में पृथिवी आदिका संभव नहीं है, अतएव जैसे आकाशमें गन्धर्वनगर,
घटाकाश, महाकाश आदि परिच्छिन्न आकाश आकाश से ही कल्पना द्वारा उत्पन्न हुआ है
वैसे ही यह आकाशात्मा जीव भी कहा गया है (यानी परम प्रकाशरूप महाकाश में उत्पन्न
हुआ है), ऐसा ज्ञान से विशुद्धान्तःकरणवाले लोग देखते हैं