Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 103
एक सौ ढोवाँ सर्ग समाप्त एक सो तीनवाँ सर्ग॑ विवेकहीन मन जिन -जिन अनर्थो की सृष्टि करता है, मुमुक्षु के विवेक के लिए उन सबका वर्णन |
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- Verse 1अनर्थो की सृष्टि करने के लिए ही परमात्मा से मन की सृष्टि हुई है, यह दशति हैँ । जैसे सागर…
- Verses 2–3मन में वस्तु के स्वभाव से विरुद्ध कल्पना करने की सामर्थ्य है, ऐसा दशति है । मन हस्व को (न…
- Verse 4मन को ऐसी सामर्थ्य कहाँ से प्राप्त हो गई, ऐसी शंका होने पर कहते हैं। उल्लसित मन परमपदरूप…
- Verse 5जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) जगत् दिखाई देता है, सम्पूर्ण पदार्थों से भरा हुआ यह सारा ज…
- Verse 6जैसे नट एक पात्र के आकार से दूसरे पात्र के आकार को धारण करता है वैसे ही देश, काल, क्रिया…
- Verse 7वह सत् पदार्थ को असत् बना देता है और असत् को सर्वथा सत् बना डालता है । तदनुरूप ही सुख…
- Verse 8चंचल मन कर्म द्वारा उपस्थापित भोग्य पदार्थ को जब जैसे जिस किसी कल्पना के ढंग से, चाहे वह…
- Verse 9तदनन्तर भोग्य पदार्थो को उपस्थित करनेवाली वह क्रिया ही चित्त द्वारा कल्पित फलाफल यानी सुख…
- Verse 10हे रामचन्द्रजी, जैसे बच्चा घर में मिट्टी से नाना प्रकार के खिलौनों को बनाता है, वैसे ही म…
- Verse 11यह जगत् एकमात्र मन की कल्पना है इसमें कोई पदार्थ वास्तविक नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं। इस…
- Verse 12जैसे ऋतुओं का निर्माण करनेवाला काल वृक्ष की अन्यरूपता कर देता है वृक्ष को विलक्षण बना देत…
- Verses 13–14जैसे मनोरथ में, स्वप्न मे ओर संकल्पकल्पनाओं मेँ अनेक योजन भूमि गोपद के समान अति अल्प प्रत…
- Verse 15यदि कोई शंका करे कि यदि मन ही सबकी सृष्टि में समर्थ है, तो हमारी इस समय सम्पूर्ण पदार्थों…
- Verse 16जैसे वृक्ष से पल्लव (नये-नये पत्ते) उत्पन्न होते हैं वैसे ही मोह, भ्रम, अनर्थ, देश, काल,…
- Verse 17व्यापारों से पूर्ण संसार चित्त ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है । भाव यह है कि कार्य कारण से…
- Verse 18कर्ता, कर्म और करण से युक्त द्रष्टा, दर्शन और दृश्य से सम्पन्न तथा भोक्ता, भोग्य ओर भोगरू…
- Verse 19सव चित्त ही है, यह जिस उपाय से दिखलाई देता है, उसे दिखलाते हुए उपसंहार करते हैं । जैसे सु…