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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

तीव्रमन्दत्वसंवेगाद्बहुत्वाल्पत्वभेदतः । विलम्बनेन च चिरं नतु शक्तिमशक्तितः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि यदि मन ही सबकी सृष्टि में समर्थ है, तो हमारी इस समय सम्पूर्ण पदार्थों की सृष्टि करने में असामर्थ्य कैसे ? इस पर कर्ते है । रजोगुण का आधिक्य होने पर तीव्रता ओर तमोगुण की अधिकता होने पर मंदता, इस प्रकार वेग के भेद से आहार की वृद्धि से पुष्टि होने पर बहुत्व ओर आहार के न्यून होनेसे क्षीणता होने पर अल्पता इनके भेद से तत्‌-तत्‌ वस्तुओं की सृष्टि के अनुकूल उपासना आदि में विलम्ब होने से मन में प्राप्त हुई जो सर्ग की (सृष्टि की) अशक्ति है, उससे हम मन की वास्तविक सर्वसृष्टिशक्ति का अपलाप नहीं कर सकते