Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परस्मादुत्थितं चेतस्तत्कल्लोल इवार्णवात् ।
स्फारतामेत्य भुवनं तनोतीदमितस्ततः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अनर्थो की सृष्टि करने के लिए ही परमात्मा से मन की सृष्टि हुई है, यह दशति हैँ ।
जैसे सागर से उसकी बड़ी-बड़ी लहरें उठती है वैसे ही परमात्मा से चित्त उत्पन्न हुआ है,
जैसे तरंग स्वस्वभाव से विशालताको प्राप्त होती है वैसे ही मन स्वस्वभाव से विशालताको
प्राप्त होकर चारों ओर भुवन का विस्तार करता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ ढोवाँ सर्ग समाप्त एक सो तीनवाँ सर्ग॑ विवेकहीन मन जिन -जिन अनर्थो की सृष्टि करता है, मुमुक्षु के विवेक के लिए उन सबका वर्णन |