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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 2-3

संस्कृत श्लोक

ह्रस्वं दीर्घं करोत्याशु दीर्घं नयति खर्वताम् । स्वतां नयत्यन्यदलं स्वं तथैवान्यतामपि ॥ २ ॥ प्रादेशमात्रमपि यद्वस्तुभावनयैव तत् । स्वयं संपन्नयेवाशु करोत्यद्रीन्द्रभासुरम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

मन में वस्तु के स्वभाव से विरुद्ध कल्पना करने की सामर्थ्य है, ऐसा दशति है । मन हस्व को (नेत्र के समीप में स्थित अंगुली आदि को) अतिविस्तृत सूर्य मण्डल आदि के आच्छादकरूप से कल्पना कर शीघ्र दीर्घ बना देता है, अतिदीर्घ सूर्यमण्डल आदि को हस्व (छोटा) बना देता हे । इरी प्रकार आत्मा ओर अनात्मा के स्वरूप की विनिमयकल्पना भी मन ही करता है । वह अनात्म देह आदि को अपनी कल्पना द्वारा आत्मा बना डालता है और उरी प्रकार आत्मा को अन्य (अनात्मा) बना डालता हे । जो वस्तु केवल एक बिलस्त भर की होती है, उसको मन शीघ्र स्वयं उत्पन्न हुई कल्पना द्वारा पर्वतराज हिमालय के समान प्रकाशमान (विशालकाय) बना डालता है