Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 103, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 103 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
जलमेव यथाम्भोधिरौष्ण्यमेव यथानलः ।
तथा विविधसंरम्भः संसारश्चित्तमेव वा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यापारों से पूर्ण संसार चित्त ही है, उससे अतिरिक्त नहीं है । भाव यह है कि कार्य कारण से
अभिन्न होता है, अतः चित्त का कार्य यह संसार भी चित्त रूप ही है