Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 4
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- Verse 1श्रीव्यासदेवजी की वर्तमान काल में भी जीवन्मुक्तता दिखलाते है । इस समय भी ये श्रीव्यासजी व…
- Verse 2मुक्ति चाहे सदेह हो अथवा विदेह हो, वह विषयाधीन तो कदापि नहीं है। यदि मुक्ति स्वर्गा आदि क…
- Verses 3–4तब ये सदेह कैसे हैं, इस पर कहते हैं। जीवनमुक्त मुनिश्रेष्ठ श्रीवेदव्यासजी को सदेह के सदृश…
- Verse 5जल में कदाचित् अस्वच्छता, मलिनता आदि से जनित अन्तर भी हो सकता है, ऐसी शंका से दूसरे दृष्…
- Verse 6सदेहमुक्ति, विदेहमुक्ति, बन्धन, मुक्ति आदि व्यवहार भी कल्पना से ही होते हैं परमार्थ दृष्ट…
- Verse 7हे रामचन्द्र, आप सर्वत्र तत्-तत् द्रष्टान्तों के स्मरण का विवक्षित सारभूत अंश वस्तु की…
- Verses 8–9भाव यह कि उक्त दृष्टान्त एक अंश में है, सब अंशो में नहीं। यहाँ पर सदेहमुक्ति की और विदेहम…
- Verse 10भाग्य के प्रतिकूल होने पर पुरूषप्रयत्न व्यर्थ देखा जाता है ओर श्रेयांसि बहुविघ्नानि“ ऐसा…
- Verse 11वह पौरुष (पुरुषप्रयत्न) क्या है, जिसकी आप इतनी बड़ी प्रशंसा करते हैं ? इस प्रश्नपर कहते ह…
- Verse 12जो मनुष्य जिस पदार्थ की अभिलाषा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए यत्न भी करता है। यदि बीच मे…
- Verses 13–17मूल में क्रमात्“ पद कहीं पर विघ्नो द्वारा कार्य का विघात शास्त्रोक्त क्रम का त्याग करने…
- Verses 18–19आधुनिक अल्प पुरुषार्थ अनेक करोड़ कल्पो से उपार्जित अनन्त प्राक्तन कर्मो पर विजय कैसे प्रा…
- Verse 20महाधनी, प्रबल और महामति लोगों को प्राप्त होनेवाला पौरुष निर्धन, निर्बल और अल्पबुद्धिवाले…