Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सदेहा वा विदेहा वा मुक्तता न प्रमास्पदम् ।
अस्माकमपि तस्यास्ति स्वैकतास्त्यविभागिनी ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
सदेहमुक्ति, विदेहमुक्ति, बन्धन, मुक्ति आदि व्यवहार भी कल्पना से ही होते हैं परमार्थ
दृष्टि से नहीं होते - ऐसा कहते हैं ।
हमारी और श्री व्यासजीकी दृष्टि में सदेहमुक्ति अथवा विदेहमुक्ति परमार्थ वस्तु नहीं है,
किन्तु द्वैतशून्य आत्मैक्य ही परमार्थ वस्तु है। उसकी प्राप्तिरूप ज्ञान-फल में कोई भेद नहीं
है, इसलिए ज्ञान में अनित्यफलतारूप दोष की आशंका का अवसर ही नहीं है, ज्ञान का उदय
होने पर देहपात की आपत्ति भी नहीं हो सकती, क्योकि विरोधी अंश का ही ज्ञान से बाध होता
0) इस श्लोक में अनन्तर कुछ पुस्तकों में - “मयोक्तं केवलीभावं तत्तत्स्मरणजीवनम् | सदेहस्य
विदेहस्य समतैव सदा शिवा ॥” यह श्लोक अधिक है । इसका यह अर्थ है-यदि कोई कहे कि वेगवान्
वायु शीतल, वृक्ष, लहर आदि के कम्पका (चंचलता का) हेतु है और त्वचा इन्द्रिय से जाना जाता
है और वेगरहित वायु उससे विपरीत है, इस प्रकार उन दोनों में भेद है ही, इसलिए भेदशून्य सदेह
और विदेह मुक्ति मेँ सस्पन्द और निःस्पन्द वायु का दृष्टान्त कैसे देते हैं उस पर कहते हैं ।
है, प्रारब्ध कर्म का फल होने से देहधारण प्रारब्धकर्म-फल ज्ञान के सदुश है ओर ज्ञानका
उपजीव्य हे, इसलिए देहधारण का ज्ञान के साथ किसी प्रकार का विरोध नहीं है, जैसे
उपादानभूत निद्रा का नाश होने पर भी स्वप्न के संस्कारों की कुछ काल तक अनुवृत्ति देखी
जाती है, वैसे ही अज्ञान का ज्ञान से विनाश होने पर जब तकं प्रारब्ध कर्म रहता है तब तक देह
आदि की स्थिति उपपन्न होती है, यह भाव है