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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

कस्यांचित्स्वयमात्मदुःस्थितिवशात्पुंसो दशायां शनै रङ्गुल्यग्रनिपीडितैकचुलुकादावापबिन्दुर्बहुः । कस्यांचिज्जलराशिपर्वतपुरद्वीपान्तरालीकृता भर्तव्योचितसंविभागकरणे पृथ्वी न पृथ्वी भवेत् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

महाधनी, प्रबल और महामति लोगों को प्राप्त होनेवाला पौरुष निर्धन, निर्बल और अल्पबुद्धिवाले लोगों को कैसे प्राप्त होगा ? ऐसी शंका कर उनको भी स्वशक्ति के अनुरूप निरन्तर पौरूष से इस जन्म में या जन्मान्तर में विपुल धन आदि सम्पत्ति से उक्त पौरुष प्राप्त हो सकता है। किसी पुरुष की निरन्तर सुदशा या दुर्दशा नहीं रह सकती, इस अभिप्राय से शास्त्रीय प्रयत्न और शास्त्रीय प्रयत्न में ढिलाई करना-इन दोनों के फल में बड़ा अन्तर दिखलाते हैं। पुरुष जब शास्त्रीय यत्न को शिथिल करता है, तब स्वाभाविक रागादि दोषों से असन्मार्ग में आसक्ति होने के कारण दारिद्रय, रोग, बन्धन आदि दुर्दशा में, जबकि अपने हाथ आदि भी अपने काबू में नहीं रहते, अंगुलियों को खूब तोड़ मरोड़कर बनाये गये चुल्लू के चुल्लूभर जल से मुँह में पडे हुए एक बुँद जल को भी दुर्लभ होने के कारण अधिक समझता है, वही जब शास्त्रीय प्रयत्न में दृढ़ रहता है, तब धर्म के उत्कर्ष से प्रियव्रत महाराज के समान सात द्वीपों की एक छत्र आधिपत्य दशा में अवश्य पोषणीय पुत्र आदि के लिए यथायोग्य दायभाग का विभाग करने में समुद्र, पर्वत, नगर और द्वीपों से व्याप्त विशाल पृथ्वी को भी अधिक नहीं समझता