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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verses 13–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verses 13–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 13-17

संस्कृत श्लोक

पौरुषेण प्रयत्नेन त्रैलोक्यैश्वर्यसुन्दराम् । कश्चित्प्राणिविशेषो हि शक्रतां समुपागतः ॥ १३ ॥ पौरुषेणैव यत्नेन सहसाम्भोरुहास्पदम् । कश्चिदेव चिदुल्लासो ब्रह्मतामधितिष्ठति ॥ १४ ॥ सारेण पुरुषार्थेन स्वेनैव गरुडध्वजः । कश्चिदेव पुमानेव पुरुषोत्तमतां गतः ॥ १५ ॥ पौरुषेणैव यत्नेन ललनावलिताकृतिः । शरीरी कश्चिदेवेह गतश्चन्द्रार्धचूडताम् ॥ १६ ॥ प्राक्तनं चैहिकं चेति द्विविधं विद्धि पौरुषम् । प्राक्तनोऽद्यतनेनाशु पुरुषार्थेन जीयते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

मूल में क्रमात्‌“ पद कहीं पर विघ्नो द्वारा कार्य का विघात शास्त्रोक्त क्रम का त्याग करने से ही होता है” यह सूचित करने के लिए है । भाव यह कि सागोपाग कर्म करने से अवश्य फलप्राप्ति होती है । उक्त नियम को ही विविध दृष्टान्तों से ठढ करते हैं । कोई एक प्राणी ही पुरूषप्रयत्न से तीनों लोकों के महा ऐश्वर्य से अतिरमणीय इन्द्रपदवी को प्राप्त हुआ है। कोई चिदुल्ला (चित्‌ उत्कर्ष से उत्कृष्ट) (=) प्राणी ही पौरुष प्रयत्न से कमलासन में स्थित होकर ब्रह्मा के पद को प्राप्त हुआ हे । सारभूत अपने पुरुषार्थ से ही कोई पुरुष गरूड़ध्वज होकर पुरुषोत्तमता को प्राप्त हुआ हे । अपने पुरुषार्थ से ही, कोई देही, अर्धनारीश्वर बनकर चन्द्रशेखरता को प्राप्त हुआ है । पौरुष दो प्रकार का है, एक पूर्वजन्म का और दूसरा इस जन्म का | आधुनिक पुरुषार्थ द्वारा पूर्व जन्म का पुरुषार्थ शीघ्र तिरस्कार को प्राप्त होता है