Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
न मनागपि भेदोऽस्ति सदेहादेहमुक्तयोः ।
सस्पन्दोऽप्यथवाऽस्पन्दो वायुरेव यथानिलः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जल में कदाचित् अस्वच्छता, मलिनता आदि से जनित अन्तर भी हो सकता है, ऐसी
शंका से दूसरे दृष्टान्त द्वारा उक्त अर्थ का समर्थन करते हैं ।
सदेह ओर विदेह मुक्ति मेँ तनिक भी भेद नहीं हे जैसे कि वेगवान् और वेगरहित वायु वायु
ही है उसमें कुछ भी अन्तर नहीं है (=)