Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verses 8–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
सर्वमेवेह हि सदा संसारे रघुनन्दन ।
सम्यक्प्रयुक्तात्सर्वेण पौरुषात्समवाप्यते ॥ ८ ॥
इह हीन्दोरिवोदेति शीतलाह्लादनं हृदि ।
परिस्पन्दफलप्राप्तौ पौरुषादेव नान्यतः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
भाव यह कि उक्त दृष्टान्त एक अंश में है, सब अंशो में नहीं। यहाँ पर सदेहमुक्ति की और
विदेहमुक्ति की एकता उपमेय है, उनके सादृश्य के लिए कथित सस्पन्द ओर निःस्पन्द वायु
की एकता उपमान है उसका विवक्षित सारभूत अंश उपमेय के साद्रश्य को उल्लसित करनेवाला
केवलीभाव है, परिस्पन्द के त्याग से केवल एक अंश से - टेक्यसाद्श्यरूप से-उपमेय को
उपमा का विषय समझो। ऐसी अवस्था मेँ सदेहमुक्त ओर विदेहमुक्त की सदा कल्याणकारिणी
समता ही है । इस प्रकार अवान्तर सन्देह के निवृत्त होने पर प्रस्तुत कथा का अवसर दशति
हैं। श्री शुकदेव आदि शम, दम आदि साधनों से परिपूर्ण थे, अतएव उन्हें श्रवणका फल ज्ञान
तदुपरान्त विदेहमुक्त प्राप्त हुई, आधुनिक पुरुष उक्त साधनों का सम्पादन करने में समर्थ
नहीं है; अतः उन्हें श्रवण का फल कैसे प्राप्त होगा ? ऐसी शंका होने पर संसारमें ऐसा कोड
पदार्थ नहीं है जो पुरुष के प्रयत्न से साध्य न हो, यह कहते है ।
हे रघुनन्दन, इस संसार में भली भाँति निरन्तर किये गये प्रयत्न से सबको सदा सब पदार्थ
मिल सकते हैं । जहाँ कहीं प्रयत्न में विफलता देखी जाती है, वहाँ पर निरन्तर प्रयत्न का
अभाव ही कारण है शास्त्रविहित शारीरिक, वाचिक और मानसिक कर्मो से होनेवाली चित्तशुद्धि
द्वारा जायमान ज्ञान की प्राप्ति होने पर हृदय में, चन्द्रमा के समान, काम, क्रोध आदि सन्ताप
से शून्य जीवन्मुक्तिसुखमुद्रा उदित होती हे । श्रुति भी कहती हे- “स एको ब्रह्मणः आनन्द: |
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ।” (कामनाशून्य ब्रह्म विद्भरिष्ठ का आनन्द ओर ब्रह्म का आनन्द
एक ही है) ओर स्मृति भी है - "यच्च कामसुखं लोके" (लोक में जो वैषयिक सुख है और जो
महान् स्वर्गीय सुख हे, वे दोनों तृष्णाक्षय से उत्पन्न परमानंद की सोलहवीं कला को भी प्राप्त
नहीं होते) उक्त सम्पूर्ण सुख पुरुषप्रयत्न से ही प्राप्त हो सकता है, अन्य से (दैव आदि से)
नहीं, इसलिए पुरुष को प्रयत्न पर ही निर्भर रहना चाहिए