Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 4, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पौरुषं स्पन्दफलवद्दृष्टं प्रत्यक्षतो नयत् ।
कल्पितं मोहितैर्मन्दैर्दैवं किंचिन्न विद्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
भाग्य के प्रतिकूल होने पर पुरूषप्रयत्न व्यर्थ देखा जाता है ओर श्रेयांसि बहुविघ्नानि“
ऐसा लोकप्रवाद भी है, अतः पुरुषप्रयत्न से फल की आशा करना दुराशा ही है, ऐसी शंका कर
दैव का (भाग्य का) पौरुष में अन्तभवि और दुर्बलत्व के अभिप्राय से उसका खण्डन करते हैं ।
क्रिया द्वारा दूसरे देश में पहुँचाता हुआ और तृप्ति कराता हुआ, गमन, भोजन आदि
पुरुषप्रयत्न प्रत्यक्षतः क्रियारूप फलवाला देखा गया हे । दैव को प्रत्यक्षतः किसीने नहीं देखा ।
वस्तुतः वह कुछ है ही नहीं, अज्ञानमोहित मूढ पुरुषों की वह कोरी कपोलकल्पनामात्र है