Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 12
ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त बारहवाँ सर्ग संसारप्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य ओर राम में प्रश्नकर्ता के गुणोँ की अधिकता का वर्णन |
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- Verses 1–3अन्य लोगों के प्रति भी विवेक वैराग्य की अभिवृद्धि के लिए संसारप्राप्ति की अनर्थङरूपता और…
- Verses 4–6प्राप्त होती है, वैसे ही विवेक के संसर्ग से उत्पन्न वैराग्य को आप प्राप्त हुए हैं । जैसे…
- Verse 7इस कथा श्रवणरूप कार्य की अवधि कौन है ? ऐसी आशंका होने पर परम पदसाक्षात्काररूप विश्रान्ति…
- Verses 8–14उक्त विश्रान्ति में अविश्वास का निराकरण करते हैं। यदि विशुद्ध चित्तवाले पुरुष को विज्ञानर…
- Verses 7–14भगवती श्रुति भी कहती है - (भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंश्याः । क्रीयन्ते चाऽस्य…
- Verses 15–16मल-मूत्र आदि के नगररूप शरीरों में (पुत्र, कलत्र आदि पोष्य जनोंमें) पुरुष को अनुराग से बाँ…
- Verse 17> इस श्लोक का दूसरा अर्थ टीकाकारों ने यों किया है-पत्थर खाना, तलवार द्वारा अंगछेदन, पर्वत…
- Verse 18शास्त्र के विचार से कल्याण होता है, यह निश्चय कैसे हो 2 क्योकि शारत्रविचार में परायण माण्…
- Verse 19उनकी स्थिति कैसी है ? इस लोक में कौतुकरहित (कौतुक से-विषय के दर्शन और उपभोग में उत्साह से…
- Verse 20गुरू आदि केसाथ विचार कर पदार्थ का परिशोधन होने पर पहले स्थूल आदि शरीरों में तादात्म्याध्य…
- Verses 21–22हे रामचन्द्रजी, ओर भी सुनिए, चैतन्यमात्रस्वभाव परमार्थ वस्तु के प्रसन्न होने ओर हृदय में…