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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अन्यस्य रघुकुलेन्दो यदि चैते महामुनयो महर्षयश्च विप्राश्च राजानश्च ज्ञानकवचेनावगुण्ठितशरीरास्ते कथमदुःखक्षमा अपि दुःखकरीं तां तां वृत्तिपूर्विकां संसारकदर्थनामनुभवन्तः सततमेव मुदितमनसस्तिष्ठन्ति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

शास्त्र के विचार से कल्याण होता है, यह निश्चय कैसे हो 2 क्योकि शारत्रविचार में परायण माण्डव्य आदि की भी हजारों दुर्दशा देखी गई हैं, इस शंका का परिहार करते हुए विद्या की दुष्टफलता का प्रतिपादन करते हैं । हे रघुकुलनन्दन, ज्ञानरूपी कवच से गुप्त शरीरवाले अतएव दुःख के सर्वथा अयोग्य भी ये ध्यानपरायण महामुनि, मन्त्रजपनिरत ऋषि, यज्ञ-याग आदि करनेवाले ब्राह्मण एवं जनक आदि राजा अज्ञानियों के समान मनोवृत्ति से होनेवाली पूर्वोक्त अनेक प्रकार की संसारपीड़ा का अनुभव करते हुए रहते हैं, ऐसा यदि तुम्हारा ख्याल है, तो वे कैसे सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं