Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तदेवंविधकष्टचेष्टासहस्रदारुणे संसारचलयन्त्रेऽस्मिन् राघव नावहेलना कर्तव्या अवश्यमेव विधारणीयमेवं चावबोद्धव्यं यथा किल शास्त्रविचाराच्छ्रेयो भवतीति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
> इस श्लोक का दूसरा अर्थ टीकाकारों ने यों किया है-पत्थर खाना, तलवार द्वारा अंगछेदन,
पर्वत के शिखर से निपातन और पत्थरों की मार को हिमसेक की नाई सहन करना पड़ता है; कुल्हाड़े
और कैंची द्वारा हाथ, पैर आदि अंगों का कर्तन चन्दनलेप की भाँति सहना पड़ता है; असिपत्रवाले वृक्षों
के वन में दौड़ना, घुन के समान काठ के यन्त्र में जकड़ा जाना तथा लोहे की गर्म जंजीरों से शरीर को
लपेटना देहसंस्कार की नाई सहना पड़ता है; अग्नि की ज्वाला को बरसा रहे भयानक बाणों की लगातार
वृष्टि ग्रीष्मकाल में विनोद के लिए बनाये गये धारा-गृहों के फुव्वारों की वृष्टि के समान सहनी पड़ती है;
शिर के कटने से हुई मृत्यु निद्रासुख के समान सहनी पड़ती है; मुँह बन्द करने से बलपूर्वक किया गया
मूकीभाव स्वाभाविक मूकमुद्रा के समान सहना पड़ता है एवं अंगों की छोटाई-बड़ाई से उत्पन्न
अकिंचित्करता महती सम्पत्ति की वृद्धि के समान सहनी पड़ती है।
दुःख देने के स्थान तो अनन्त है, उनकी तो गणना ही नहीं हो सकती, यह तो केवल
दिङ्मात्र का प्रदर्शन है, यों दर्शाकर उसका उपसंहार करते हुए प्रकृत मे उनके वर्णन की
उपयोगिता कहते है ।
हे राघव, नश्वर देहो, परतन्त्रतापूर्णं एवं इस प्रकार की हजारों कणष्टप्रद चेष्टा ओं से अतीव
क्लेशकारक इस संसार में अवहेलना (अनादर) नहीं करना चाहिए, आगे कही जानेवाली
रीतिसे विचार करना चाहिए ओर वक्ष्यमाण रीति से ही निश्चय करना चाहिए कि शास्त्र के
विचार से कल्याण होता है