Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
दुरन्तेयं किल विषयविषूचिका यदि न चिकित्स्यते तन्नितरां नरकनगरनिकरफलानुबन्धिनी तत्तत्करोति ॥ १५ ॥
यत्र शिलाशितासिशातः पात उपलताडनमग्निदाहो हिमावसेकोऽङ्गावकर्तनं चन्दनचर्चातरुवनानि घुणवृत्तान्तःपरिवेषोऽङ्गपरिमार्जनमनवरतानलविचलितसमरनाराचनिपातो निदाघविनोदनं धारागृहसीकरवर्षणं शिरश्छेदः सुखनिद्रामूकीकरणमाननमुद्राबान्धुर्य महानुपचयः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
मल-मूत्र आदि के नगररूप शरीरों में (पुत्र, कलत्र आदि पोष्य जनोंमें)
पुरुष को अनुराग से बाँधनेवाली यह विषयविषूचिका दुरुच्छेद्य (अकाट्य) हे । यदि इसकी
चिकित्सा न की जाय, तो आगे कही जानेवाली हजारों नारकीय दुर्गतियोँ को प्राप्त कराती
है । जहाँ जीवों को पत्थर खाने पडते हैं, तलवारों से उनके टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं,
पर्वतो की चोटियों से वे गिराये जाते हैं, पत्थरों से मारे जाते हैं, आग से जलाये जाते हैं,
बर्फ से सदा तर रक्खे जाते हैं, अंग-प्रत्यंग कुल्हाड़े, कैंची आदि से काटे जाते हैं, चन्दन
की नाई पत्थरों पर धिसे जाते हैं, तलवार के समान तीक्ष्ण पत्तेवाले वृक्षों के वन में दौड़ना
पडता है, घुनों का-सा व्यवहार होता है अर्थात् सर्वाग में काठ के यन्त्रो से पीड़ा पहुँचाई
जाती है, तपाई गई लोहे की बड़ी-बड़ी जंजीरों से शरीर को लपेटा जाता है, कटिदार ्आाड़ओं
से शरीर बुहारा जाता है (त्वचारहित किया जाता है), जिनसे सदा आग की लपटें निकलती
रहती हैं, ऐसे युद्ध में छोड़े गये बाणों की धारावाहिक वृष्टि होती है, छाया और पानी के
बिना ग्रीष्मकाल बिताना पड़ता है, अतिशीत धारागृहों में लगातार झरनों की वृष्टि होती है,
पहले काटे गये सिर के पुनः उगने पर फिर-फिर उसका काटना होता है, सुखपूर्वक नींद
की तो वहाँ बात भी नहीं होती, मुँह को ढककर श्वास-प्रश्वास भी रोक दिया जाता है, अंगों
की निम्नता और उन्नतता से विसंछुल (विषम अवयव) होने के कारण व्यवहार की अयोग्यता
होती है, यह सब महासम्पत्ति की अभिवृद्धि के समान सहना पड़ता है (०३)