Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
परिक्षीणे मोहे विगलति घने ज्ञानजलदे परिज्ञाते तत्त्वे समधिगत आत्मन्यतितते ।
विचार्यार्यैः सार्धं चलितवपुषो वै सदृशतो धिया दृष्टे तत्त्वे रमणमटनं जागतमिदम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
गुरू आदि केसाथ विचार कर पदार्थ का
परिशोधन होने पर पहले स्थूल आदि शरीरों में तादात्म्याध्यास से जो आत्मसादृश्य था, वह
जिसका निवृत्त हो गया है, उस अधिकारी पुरुष को “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों के अर्थ के
विचार से तत्त्व के ज्ञात होने पर, मनन द्वारा असंभावना और विपरीत भावना के निराकरण से
अपरिच्छिन्न आत्मा के विदित होने पर, निदिध्यासन द्वारा विपरीतभावनाशून्य बुद्धि से ब्रह्म
का साक्षात्कार होने पर मोह के नष्ट होने एवं अति निविड भ्रम ज्ञान के विलीन होने पर यह
जगत् का भ्रमण मनोविनोद (आनन्दसाधन) ही है, दुःखकारी नहीं है