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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, Verses 4–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 12, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 12 · श्लोक 4-6

संस्कृत श्लोक

आप्तवानसि वैराग्यं विवेकासङ्गजं सुत । चन्द्रकान्त इवार्द्रत्वं लग्नचन्द्रकरोत्करः ॥ ४ ॥ चिरमाशैशवादेव तवाभ्यासोऽस्ति सद्गुणैः । शुद्धैः शुद्धस्य दीर्घैश्च पद्मस्येवातिसंततैः ॥ ५ ॥ अतः शृणु कथां वक्ष्ये त्वमेवास्या हि भाजनम् । न हि चन्द्रं विना शुद्धा सविकासा कुमुद्वती ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राप्त होती है, वैसे ही विवेक के संसर्ग से उत्पन्न वैराग्य को आप प्राप्त हुए हैं । जैसे कमल का चारों ओर फैले हुए एवं कभी नष्ट न होनेवाले दीर्घ तन्तुओं ओर सुगन्ध आदि से सम्बन्ध रहता है वैसे ही बाल्यावस्था से लेकर ही चिरकाल से शुद्ध आपका सब दिशाओं में फैले हुए एवं अविच्छिन्न शुद्ध सद्गुणो से सम्बन्ध हे । इसलिए हे राघव, सुनिए, मेँ आपसे यह मोक्षकथा कर्हूगा, क्योंकि आप ही इस कथा के योग्य पात्र हैं अर्थात्‌ श्रवणजनित प्रकृष्ट बोध के आधार हैं। शुद्ध (शुभ्र) कुमुदिनी चन्द्रमा के विना विकासयुक्त नहीं हो सकती अर्थात्‌ जैसे शुद्ध कुमुदिनी चन्द्रमामें ही (चन्द्रमा के उदित होने पर ही) विकसित होती है वैसे ही यह मोक्षकथा आप में ही विकास को प्राप्त होगी