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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 98

सत्तानबेवाँ सर्ग समाप्त अद्भानवेवों सर्ग तत्त्वज्ञानी सन्तो के लक्षण तथा परीक्षा द्वारा उनके दोषों की उपेक्षा कर उनका आश्रय लेने का वर्णन।

21 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, विरक्त एवं विवेकसम्पन्न जो महात्मा परमपद ब्रह्म मे…
  2. Verse 2तत्त्वज्ञानी महात्मा न तो किसीसे प्रसन्न होते हैं, न किसी पर क्रोध करते हैं, न किसी विषय…
  3. Verse 3शरीर को अधिक कलेश पहुँचाने काले पारलोकिक वैदिक कर्मों में भी शुष्क वैदिक के सदश हठ से प्र…
  4. Verse 4तत्त्वज्ञ लोग अपने संग से चन्द्रकिरणों के सदुश अन्तःकरण को उल्लास युक्त बना देते हैं करने…
  5. Verse 5तत्त्वज्ञ के आचरण से कभी उद्वेग नहीं होता, वे सबके बन्धु-से तथा चातुर्यपूर्ण रहते हैं बाह…
  6. Verse 6तत्त्वज्ञ शास्त्रों के अर्थों में बड़ा ही रस लेते हैं, उत्तम और अधम लोकों को जानते हैं, क…
  7. Verses 7–9लोकशास्त्र के विरुद्ध आचरणों से सदा विरत रहते हैं, सज्जनों के बीच स्थिति में यानी सदाचरण…
  8. Verse 10भार्या के सदृश अनेक गुणों से पूर्ण शान्तआकृति ज्ञानी पुरुष विपत्तियों में उत्साह देते हैं…
  9. Verse 11यशरूपी फूलों से सारी दिशाओं को निर्मल बनानेवाले, भावी उत्तम फल के हेतु तथा कोकिल के सदृश…
  10. Verses 12–13अज्ञानी राजा आदि के चित्त को एक महासागर ही समझना चाहिए, इसमें अनेक तरह के कल्लोल ही बड़े…
  11. Verse 14भद्र, आपदाओं मे, बुद्धिनाश मे, भूख-प्यास, शोक-मोह, जरा-मरण आदि कल्लोलों मे, व्याकुल देशों…
  12. Verse 15हे श्रीरामजी, इन लक्षणों से तथा दूसरे पूर्ववर्णित लक्षणों से उन उत्तम अन्तःकरणवाले महात्म…
  13. Verse 16भद्र. यह संसारूपी साँपों से भरा हुआ अत्यन्त विषमय सागर सतसंगरूपी जहाज को छोडकर दूसरे किसी…
  14. Verse 17हमको आत्मा या सत्पुरुष के सम्बन्ध में विचार करने से क्या, प्रारबधवश जो भी कुछ समय पर हो ज…
  15. Verse 18भद्र, मैंने अभी अभी आपसे जिन उत्तम गुणों का वर्णन किया, उनमें से यदि एक भी गुण किसी में उ…
  16. Verse 19गुण और दोषों को जानने के लिए बाल्यावस्था से लेकर अपने आप प्रयास करना चाहिए, अपने प्रयत्न…
  17. Verse 20यदि दोष का कुछ लेश होवे, तो उसको न देख कर सज्जन की नित्य सेवा करनी चाहिए ओर स्थूल दोषवाले…
  18. Verse 21पूर्व परिजनों का त्याग न करने पर कौन दोष उपस्थित होते हैं; उन्हें बतलाते हैं। उनका परिहार…
  19. Verse 22भले ही ऐसा हो, उससे भी क्या दोष हुआ 2 इस पर कहते हैं / यह जगत्‌ का अनिष्टकर महान्‌ उत्पात…
  20. Verse 23कथित का अनुवाद कर उपसंहार करते हैं / सब कार्यों को छोड़कर सज्जनो का ही समागम करना चाहिए,…
  21. Verse 24इस प्रकार का स्ज्जनसमायम, युणोपार्जन क्रम से जक तक ज्ञाननिष्ठा न हो जाय तब तक; बीच में कभ…