Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विवेकिनो विरक्ता ये विश्रान्ता ये परे पदे ।
तेषां तनुत्वमायान्ति लोभमोहादयोऽरयः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, विरक्त एवं विवेकसम्पन्न जो महात्मा परमपद ब्रह्म में
विश्रान्ति पाकर स्थित हैं, उन महात्माओं के लोभ, मोह आदि शत्रु छोटे हो जाते हैँ । लोभ-मोह की
अल्पता ही जब तत्त्वज्ञं का लक्षण है, तब उनकी निर्दोषता में तो कहना ही क्या है ?
सर्ग सन्दर्भ
सत्तानबेवाँ सर्ग समाप्त अद्भानवेवों सर्ग तत्त्वज्ञानी सन्तो के लक्षण तथा परीक्षा द्वारा उनके दोषों की उपेक्षा कर उनका आश्रय लेने का वर्णन।