Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
इत्यन्तः कल्कमासाद्य न स्थेयं गर्तकीटवत् ।
एकोऽपि विद्यते यस्य गुणस्तं सर्वमुत्सृजन् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, मैंने अभी अभी
आपसे जिन उत्तम गुणों का वर्णन किया, उनमें से यदि एक भी गुण किसी में उपलब्ध हो जाय, तो
दूसरे गुणों की या उसमें विद्यमान अन्य दोषों की परवाह न कर उतने गुण के उद्देश्य से उस महात्मा
का आश्रय लेना चाहिए