Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
न हृष्यन्ति न कुप्यन्ति नाविशन्त्याहरन्ति च ।
उद्विजन्तेऽपि नो लोकाल्लोकान्नोद्वेजयन्ति च ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी महात्मा न तो किसीसे प्रसन्न होते हैं, न किसी पर क्रोध करते हैं, न किसी विषय में
अभिनिवेश (आसक्ति) करते हैं, न खाद्य वस्तुओं का संग्रह करते हैं, न लोगों से उद्विग्न होते हैं
ओर न लोगों को ही उद्धिग्न करते हैं