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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verses 7–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, verses 7–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

विरुद्धकार्यविरता रसिका सज्जनस्थितौ । अनावरणसौगन्ध्यैः परास्पदसुखाशनैः ॥ ७ ॥ पूजयन्त्यागतं फुल्ला भृङ्गं पद्मा इवार्थिनम् । आवर्जयन्ति जनतां जनतापापहारिणः ॥ ८ ॥ शीतलास्पदवत्स्निग्धाः प्रावृषीव पयोधराः । भूभृद्भङ्गकरं धीरा देशभङ्गदमाकुलम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

लोकशास्त्र के विरुद्ध आचरणों से सदा विरत रहते हैं, सज्जनों के बीच स्थिति में यानी सदाचरण में अत्यन्त रसिक होते हैं। उपदेश से हृदयकमल को खोल कर उसमें भरे गये ज्ञान की सुगंधियों से तथा उत्तम आश्रय, सुख तथा अन्नादि से आये हुए अतिथियों की पूजा करते हैं | पूजा करते समय उनका मुखकमल विकसित रहता है, उस समय वे आगंतुक भ्रमर का आश्रयदान आदि से सत्कार कर रहे विकसित कमलों के सदृश लगते हैं । जनता के सन्‍्तापों का अपहरण करने के कारण वे जनता को अपनी ओर खींच लेते हैं ओर वर्षाकाल के मेघों के सदृश कृपावृष्टिकारक और शीतल उद्यान के सदुश स्निग्ध होते हैं । भद्र, तत्त्वज्ञानी पुरुष राजाओं के नाशक, देश को छिन्न-भिन्न करनेवाले तथा दुर्भिक्ष आदि से जनित जनता के क्षोभ को तपस्या के प्रताप, सत्कर्म के अनुष्ठान, साम आदि उपायों से ऐसे पकड़कर रोक लेते हैं, जैसे भूकम्प को पर्वत