Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 98, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
पुंस्कोकिलसमालापा माधवा इव साधवः ।
कल्लोलबहुलावर्तं व्यामोहमकरालयम् ॥ १२ ॥
लुठन्तमिव हेमन्तं लोडयन्तं जनास्पदम् ।
वीचिविक्षोभचपलं परचित्तमहार्णवम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी राजा आदि के चित्त को एक महासागर ही समझना चाहिए, इसमें अनेक तरह के
कल्लोल ही बड़े बड़े आवर्त हे , व्यामोहरूपी मगर उसमें रहते हैं, अत्यन्त शिशिर पवन से विक्षिप्त
तरगों के व्याज से हेमन्त के सदुश वह लुढकता रहता है, भ्रमर, हँस आदि के निवासस्थान पद्मवन
को विलोडित करता है, काम आदि छः वृत्तियाँ उसमें बड़े बड़े तरंग हैं उस महासागर को
उपदेशादि द्वारा साधु पुरुषरूपी तटस्थ पर्वत ही रोकने में अत्यन्त समर्थ हैं