Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 70
उनहत्तरवाँ सर्ग समाप्त सत्तरवाँ सर्ग वासना देवी के वैराग्य के कारण का और जगत् के प्रलय एवं मिथ्या विभ्रमरूपत्व का वर्णन।
28 verse-groups
- Verse 1आपने इसका पत्नी के निमित्त निर्माण क्यो किया, उत प्रश्न का उत्तर देकर अब इसको वैराग्य की…
- Verse 2हे मुनीन्द्र, इस महाप्रलय काल में अब इसका मूलोच्छेद कर अपनी सत्ता से गिराने के लिए मैंने…
- Verse 3उसमें युक्ति बतलाते हैं । यह मैं जब कि चित्ताकाशस्वरूप का त्याग कर आद्य चिदाकाशरूप हो रहा…
- Verse 4इसीलिए यह विरक्त होकर मेरे मार्ग की ओर दौड़ रही है, ऐसा उदारबुद्धि कौन जीव है, जो अपने जन…
- Verse 5भद्र, आज ही यहाँ कलिका समाप्तिकाल और चतुर्युगी का विनाश उपस्थित है एवं मनु, इन्द्र, देव आ…
- Verse 6चारों प्रकार के प्रलय आज एक ही स्राथ प्राप्त हैं यह कहते हैं । आज ही मेरे कल्प का विनाश ह…
- Verse 7हे ब्रह्मन्, इसीलिए आत्मदर्शन आदि कारणों को लेकर ही यह विद्याधरीरूप वासना विनाश की ओर जा…
- Verse 8अपने विनाश के कारण आत्मदर्शन में इसकी इच्छा क्यो हुई. ङस प्रश्न क्र उत्तर - उसका कैसा स्व…
- Verse 9केवल अभिमान ही जिसका शरीर है, ऐसी इस वासना को स्वभाव से स्वयं ही आत्मदर्शन की इच्छा उत्पन…
- Verse 10तब इसने हम लोगों का जो ब्रह्माण्ड देखा, उसमें क्या कारण है, इस पर कहते हैं / आत्मा के दर्…
- Verse 11पूर्वोक्त थिला का दर्शन भी इसको उसी सिद्धि के बल से हुआ, यह कहते हैं । आकाश में विचरण करन…
- Verse 12हम लोगों के अनेक जगद्रूप पदार्थों के अन्दर- जिस जगद्रूप पर्वत के ऊपर यह जगत् है और जिसमे…
- Verse 13परन्तु हम लोग चूँकि भेददृष्टि में यानी व्युत्थानदशा में बैठे हैं, इसलिए उनको नहीं देखते,…
- Verse 14भद्र, घट में, पट में, दीवार में, आकाश में, वायु में, जल में, तेज में, सर्वत्र-सभी जगह, शि…
- Verse 15जगत् नाम की तो एक निरर्थक भ्रान्ति ही है, ओर वह है ठीक स्वप्ननगर के जैसी । यह जगत् की म…
- Verse 16यह माया भ्रान्तिरूप परिज्ञात होकर जिनकी दृष्टि में चिदाकाशरूप बन जाती है, उनके लिए तो वह…
- Verse 17अथ "किमिद शरुतभव्येश० “ इत्यादि से अपने पास आने की सामर्थ्य में जो हेतु पूछा, उसका उत्तर…
- Verse 18हे मुने, वर्णित रीति से जीवचिति की शक्तिरूप अविद्या ऐन्द्रजालिक माया के सदृश चारों ओर फैल…
- Verse 19हे मुनिवर, यहाँ कोई भी कार्य कभी न तो उत्पन्न होते हैं और न नष्ट ही होते हैं, केवल चिति ह…
- Verse 20भद्र, ये जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, मन, बुद्धि आदि हैँ, वे सबके-सब केवल चितिरूपी शिला क…
- Verse 21शिला की आकृति धारण कर रही यह चिति ही स्थित है, इसी चिति के समस्त जगत् ऐसे अंग हैं, जैसे…
- Verse 22चिति का यह जो उलटा ज्ञान होता हैं, उसमे वितिस्वभावका परिज्ञान न होना ही कारण है, यह कहते…
- Verse 23यह जो चितिरूपा शिला है, वह वास्तव मेँ आदि-अन्त से रहित होती हुई भी भ्रम से आदि-अन्त से यु…
- Verse 24जैसे स्वप्न मेँ चिति अपने ही आकाशवत् निर्मल स्वरूप को नगररूप समझ लेती है, वैसे ही इस जाग…
- Verse 25जाग्रत में भी स्वप्न के तुल्य बाध की समानता दिखलाते हैं / भद्र, यहाँ न नदियाँ बहती हैं, न…
- Verse 26जैसे जल में विद्यमान दूसरा जल यानी समुद्र में विद्यमान तरंग आदि पृथक् स्वरूप का नहीं होत…
- Verse 27ऐसी परिस्थिति में अध्यारोपद्वष्टि से देखने पर अनन्त जयत् कदा सर्वत्र चिति सत्ता से विद्य…
- Verse 28हे वसिष्ठमुने, अब आप अपने भुवन में चले जाइए, और वहाँ एकान्त में कल्पित अपने पूर्व के आसन…