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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अथान्यधारणाभ्यासात्स्वविरागवशोदितम् । साधयन्त्याऽर्थमात्मीयं दृष्टस्त्वमनया मुने ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अथ "किमिद शरुतभव्येश० “ इत्यादि से अपने पास आने की सामर्थ्य में जो हेतु पूछा, उसका उत्तर कहते हैं । हे मुने, अब आप यह सुनिये कि आपके पास यह किस कारण से आयी । बात ऐसी है- पूर्वोक्त वैराग्यप्राप्ति के अनन्तर अपने विरागवश से इसको आत्मीय यानी अभीष्ट आत्मज्ञान की अनुकूल गुरूपसदन, श्रवण, मनन आदि की इच्छा उत्पन्न हुई । और उसे आपके उपदेश से सिद्ध करने की इच्छा रखकर इसने दूसरे (पूर्वोक्त जगत्सृष्टि के दर्शन में हेतुभूत धारणा से भिन्न) खेचरसिद्धि, ब्रह्माण्डान्तर मे गमन आदि सिद्धियों की हेतुभूत चूडालाख्यायिका में वर्णित धारणाओं के अभ्यास से आपके संकल्प से कल्पित आपका समाधिस्थान जानकर वहाँ यह पहुँच गई ओर पहुँचकर अदृश्य होते हुए भी आपको इसने देख लिया