Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
जगन्ति सन्त्येव न सन्ति शान्ते चिदम्बरे सर्वगतैकमूर्तौ ।
नभोन्तराणीव महानभोन्तश्चित्सन्ति सत्तानि पराम्बराणि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति में अध्यारोपद्वष्टि से देखने पर अनन्त जयत् कदा सर्वत्र चिति सत्ता से
विद्यमान हैं; थोड़ा-सा भी इनका अपलाप नहीं किया जा सकता ओर अपवादद्गष्टि से देखने
पर तो विति के स्वरू से भिन्न कड कस्तु कहीं पर भी समर्थित नहीं हो सकती, यह बात
हुई. यह कहते हैं /
जैसे महाकाश के भीतर दूसरे-दूसरे घटादि आकाश महाकाश की सत्ता से विद्यमान हैं और स्वतः
अलग विद्यमान नहीं हैं वैसे ही ये जगत स्वतः शून्य रूप होते हुए भी चिति की सत्ता से विद्यमान है
और अपनी सत्ता से अविद्यमान भी हैं