Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
वसिष्ठ तद्गच्छ मुने जगत्स्वं त्वं चासने संप्रति शान्तिमेहि ।
बुद्ध्यादिरूपाणि परं व्रजन्तु वयं बृहद्ब्रह्मपदं प्रयामः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे वसिष्ठमुने, अब आप अपने भुवन में चले जाइए,
और वहाँ एकान्त में कल्पित अपने पूर्व के आसन पर समाधि लगाकर विक्षेप-रहित सुख का अनुभव
कीजिये, ये मेरे कल्पित बुद्धि आदि जगत् के पदार्थ भी प्रलय प्राप्त कर परम अव्यक्त की ओर चले
जायें । हम लोग भी हिरण्यगर्भ की उपाधिभूत मूल अज्ञान का बाधकर कैवल्यपद में जा रहे हैं