Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
न सरन्तीह सरितो न चक्रं परिवर्तते ।
नार्थाः परिणमन्त्यन्तः कचत्येतच्चिदम्बरम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत में भी स्वप्न के तुल्य बाध की समानता दिखलाते हैं /
भद्र, यहाँ न नदियाँ बहती हैं, न नक्षत्रचक्र घूमता है, न अर्थो का परिणाम हो रहा है, किन्तु
अपने भीतर केवल चितिरूप आकाश ही प्रकाशित हो रहा है