Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
विज्ञानघनमात्मानं जगदित्यवबुध्यते ।
अनाद्यन्तापि साद्यन्ता चित्त्वादिति गतापि चित् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति का यह जो उलटा ज्ञान होता हैं, उसमे वितिस्वभावका परिज्ञान न होना ही कारण है,
यह कहते हैं /
विज्ञानघन आत्मा को जगत् समझना चिति का ही कार्य है । स्वयं अनादि एवं अनन्त होती हुई
भी असली चित्स्वभाव के अपरिज्ञान से देश-वस्तु से जनित परिच्छिन्न भाव को भी प्राप्त चिति
ही हो जाती है