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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 206

दो सौ चारवाँ सर्ग समाप्त दोसौ पाँचवाँ सर्म केवल विषयमात्र स्वरूपवाली यह जगत्‌ स्थिति स्वप्नतुल्य है ।

20 verse-groups

  1. Verses 1–2न यह कभी उत्पन्न हुई, न स्थित है और न नष्ट हुई यह केवल चिन्मात्र ही है । इस प्रकार जगत्‌…
  2. Verse 3उपपन्न नहीं होता, यह अर्थ है
  3. Verse 4विर्वत में अनुत्पत्ति का ही उपपादन करते हैं। समस्त कारणाकारों मे अस्तमयरूपवाले सर्गादि मे…
  4. Verse 5अदेह चिति जाग्रत्‌ और स्वप्न में सदेहवत्‌ कैसे होती है, यह प्रश्न भी अनुत्पन्न है क्योकि…
  5. Verse 6अतः विवर्तपक्ष निर्दोष है यह कहते हैं। इसलिए चिदाकाश स्वप्नवत्‌ प्रतीत होनेवाले स्वरूपमात…
  6. Verse 7यह जो चिदात्मा का भानमात्र है वही स्वप्नभान है और वही जगदाकृति चिदाकाशरूप ही स्वप्न विवर्…
  7. Verse 8चिदाकाश का जो यह वेदन है यह आकाश के समान निर्मल है इस वेदन के अन्दर भासमान चित्‌ का रूप स…
  8. Verse 9इस प्रकार रूपप्रपंच के वेदनमात्र होने पर नामप्रपंच भी वेदन का ही एक नाम भेद प्रसिद्ध होता…
  9. Verse 10अतएव स्वप्न आदि की निवृत्ति होने पर भी वह तत्त्व (भान) कभी शान्त नहीं होता, ऐसा कहतेहै। उ…
  10. Verse 11उसके (चिद्भान के) सद्भाव से ही उसमें बहुत-से विवर्त हुए हैं, ऐसा कहते हैं। बहुत-सी भिन्न-…
  11. Verses 12–17कौतुकवश इस ब्रह्माण्ड के स्वरूप को सुनने की इच्छा से श्रीरामचन्द्रजी प्रश्न की भूमिका निर…
  12. Verses 18–19यह आपका प्रश्न तत्त्वज्ञानविषयक अथवा तत्त्वज्ञानोपयोगी नहीं है, न इसका कोई प्रयोजन है, न…
  13. Verse 20जैसा यह आपने जाना है, जैसा आगमों द्वारा वर्णित है वह सब ज्यों-का-त्यों स्थित है इसके विषय…
  14. Verse 21तो ब्रह्म कैसे ब्रह्माण्डाकार बना, कितने काल तक ब्रह्माण्डाकार रहेगा ? यह मुझसे कहने की क…
  15. Verses 22–25ब्रह्म कभी साकार नहीं हुआ, न उसका कालिक परिच्छेद ही है किन्तु अज्ञानी जीव जव तक अज्ञान रह…
  16. Verse 26चिदेकस्वभान ब्रह्म में चित्स्वभाव से विरुद्ध पर्वत काठिन्य आदि स्वभाव कैसे सत्य हो सकते ह…
  17. Verse 27चिति ही भ्रान्त वेतन को तथा उस उस रूप से स्थित-सी प्रतीत होती है वस्तुतः वह उस रूप में नह…
  18. Verses 28–34जैसे स्वप्न में अशिला ही शिला होती है, अनाकाश ही आकाश होता है यानी शिला तथा आकाश से अतिरि…
  19. Verse 35सब कुछ दृश्य शान्त, निराधार, निरामय (निर्दोष) ज्ञानमात्र है। यहाँ न जगत्‌ की सत्ता है अथव…
  20. Verses 36–37शान्त निराधार ज्ञप्तिमात्र दृश्य का आभास होने में दृष्टान्त देते हैं। मनोपंख से कल्पित नग…