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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

पूर्वे तस्यामभूद्राजा प्रज्ञप्तिरिति विश्रुतः । अनुरक्तजगद्भूतः शक्रः स्वर्ग इवापरः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अदेह चिति जाग्रत्‌ और स्वप्न में सदेहवत्‌ कैसे होती है, यह प्रश्न भी अनुत्पन्न है क्योकि पृथिवी आदि के अभाव मे जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्ज इन चार प्रकार के भूतो के शरीर भी असत्‌ ही हैं ऐसा कहते हैं। इसलिए पृथिवी आदि के अस्तित्व में ही होनेवाला यह शरीर कुछ भी नहीं है । ये भूत ही निश्चय करके देह हैं और उनका सर्वथा अभाव हे