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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 12–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, verses 12–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 12-17

संस्कृत श्लोक

कः कर्ता कोऽथ वा द्रष्टा काधाराधेयता कथम् । न कदाचिन्महानाशो जगतामिति निश्चयः ॥ १२ ॥ समस्तवेदशास्त्रार्थाविरोधाय समर्थितः । यथा संवेदनं नाम तथा नामानुभूतयः ॥ १३ ॥ यतस्ततो वेदनं स्यात्किमनाशमसन्मयम् । अन्यच्च जम्बूद्वीपादौ देशेऽद्य मुनिनायक ॥ १४ ॥ मृतानामग्निदग्धानामिह वा देहनाशिनाम् । नरकस्वर्गभोगाय विदेहे देहकारणम् ॥ १५ ॥ किं तत्स्यात्सहकारीणि कारणान्यथ कानि वा । धर्माधर्मावमूर्तौ द्वौ तस्यामूर्तस्य मूर्तता ॥ १६ ॥ निर्द्रव्यं कुरुते द्रव्यैर्युक्तिरित्यसमञ्जसा । मातापित्राद्यभावो हि बीजं किं तत्र कारणम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

कौतुकवश इस ब्रह्माण्ड के स्वरूप को सुनने की इच्छा से श्रीरामचन्द्रजी प्रश्न की भूमिका निर्माण करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आपने लीलोपाख्यान, भुशुण्डाख्यान आदि में करोड़ों प्रकार की सृष्टियों का वर्णन किया है। उनमें से कुछ ब्रह्माण्डकोश में स्थित हैं, कुछ उससे रहित यानी मन आदि में स्थित हैं, कुछ भूकोश में स्थित हैं, कुछ आकाशकोश में स्थित हैं, कुछ तेजकोश में स्थित हैं और कुछ वायुकोश में स्थित हैं कुछ आकाशतल में स्थित गोलाकार भूमिपीठ हैं, उनमें रहनेवाले उर्ध्व तथा अधोभाग में स्थित चिंटियों के समान भूगोल से चिपके हुए देव, असुर आदि हम ही ऊपर हैं हम ही ऊपर हैँ यों विविध निश्चयवाले हे, क्योकि सबकी दृष्टि से भूमि के अधोभाग के जन, भूमि के मूलाकाश से जिनके पैर ऊपर की ओर ओर सिर नीचे की ओर रहता है, ऐसे प्रतीत होते है । इस तरह उन लोकों में ऊर्ध्वमूल अधःशाखा ओर शिखरवाले होने के कारण वन और पर्वत लटके हुए से मालूम होते हैं। कुछ वातमय (वायु शरीरवाले) प्राणियों से परिपूर्ण हैं, कुछ निरन्तर अन्धकार से व्याप्त हैं, कुछ आकाशमय शरीर धारण करनेवाले जीवों से भरे हैं और कुछ सृष्टियाँ गूलर के फल के समान कोटि कोटि कीड़ों से व्याप्त हे । कुछ आकाशकोश में स्थित हैं, कुछ सृष्टियाँ शिलाओं के गर्भ में स्थित हैं, कुछ भाण्ड-वर्तन युक्त, मण्डप आदि के कोश में स्थित हैं और कुछ आकाश में पक्षियों के समान स्थित हें । हे भगवन्‌, हे तत्त्ववेत्ता ओं मे श्रेष्ठ, उनमें से हमारा आश्रयभूत यह ब्रह्माण्ड जिस प्रकार का ओर जैसा स्थित है, वह मुझसे कहने की कृपा कीजिये