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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 206, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 206 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

अन्ये वा हेतवः के स्युः कथं द्रव्यादिसंभवः । परलोकोऽस्य नास्तीति यथासंवेदनं स्थितेः ॥ १८ ॥ समस्तलोकवेदादिविरोधाच्चासमञ्जसम् । अनिच्छितेहितैर्दूरदेशान्तरगतैः फलम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आपका प्रश्न तत्त्वज्ञानविषयक अथवा तत्त्वज्ञानोपयोगी नहीं है, न इसका कोई प्रयोजन है, न प्रकृत वेदान्त- वर्चा के उपयुक्त है, न अपूर्व है ओर न नियत (सदा सवके मत से एकरूप) है, क्योकि मुनियों द्वारा विभिन्‍न ज्योतिष सिद्धान्तो में भूमि, वन आदि की स्थिति अन्यथा (अन्यान्य प्रकार से) वर्णित है । यह सव मैं पहले दिखला चुका हूँ, अतएव मायामय स्वप्नतुल्य इसके विषय में किसी एक का पक्षपात कर सिद्धान्त कथनों का कोई प्रयोजन नहीं है, ऐसा समझ रहे श्रीवस्रिष्ठजी यह विषय अन्य शास्त्रों का है, उनसे आपको ज्ञात हो ही चुका है, इसलिए यह विषय प्रश्नयोग्य नहीं है, यों समाधान करते हैं । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जो वस्तु अपूर्व हो (अन्य प्रमाणों का गोचर न हो), जो इष्ट न हो, अनुभूत न हो अथवा श्रुत न हो यानी प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द का विषय न हो उसीका गुरु सुन्दर सुन्दर दृष्टान्तों से प्रतिपादन करता है तथा शिष्य श्रवण द्वारा उसीका ग्रहण और मनन द्वारा उसीका ऊहन करता है अन्य का नहीं, यह अर्थ है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इस ब्रह्माण्ड का तो ज्योतिष आदि आगमों ने (वेद-शास्त्रों ने) तथा शास्त्र के प्रवर्तक मुनियों तथा देवताओं ने शतशः (अनेक प्रकारों से) वर्णन किया है यह अपूर्व नहीं है और आपको ज्ञात ही है