Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 195
एक सौ तिरानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौरानबेवाँ सर्ग मोक्षसाधन आत्मतत्त्व ओर जगततत््व जिस भाँति रामचन्द्रजी ने जाना, उसका गुरुजी के समीप निवेदन ।
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- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सब जीवों की सब मनोवृत्तियों मे जब जव जिस जिस भोग के लिए…
- Verse 2असंलग्न होकर रहती हैं, क्योकि वे सब जीवसृष्टियाँ इस प्रकार के निरवयव ब्रह्म में तादात्म्य…
- Verse 3दृष्ट यानी समीपवर्ती (प्रत्यक्ष), देश और काल के व्यवधान से परोक्ष जगद्रूप रश्मियाँ इस परम…
- Verses 4–5उनमें जिन जीवों का समान कर्मवासनानिमित्त अध्यास होता है उनको आपस में एक दूसरे का अनुभव हो…
- Verses 6–7समुद्र मे जलपरमाणु के रस के तुल्य सर्वत्र सर्वतः व्याप्त चिद्घन परमात्मा का जो नित्य आत्म…
- Verse 8वास्तव में एकरूप (अद्वितीय) माया से अनन्त रूपवाले परमात्मा की जगत् अधिष्ठानस्वभावता कारण…
- Verse 9जैसे स्फुरित हो रही सूर्य की दीप्ति घट, पट आदि का प्रकाश करती है वैसे ही स्फुरित हो रही अ…
- Verse 10तब कब और किस उपाय से वह अध्यात्म-व्यसन का त्याग करती है ? इस प्रश्न पर कहते है । तत्त्वज्…
- Verse 11अध्यास परम्पराओं की समाप्ति से ही स्वयं अपना परमपुरुषार्थ अवशिष्ट रहता है, यह कैसे संभव ह…
- Verse 12इसलिए अध्यासपरम्परा चरम साक्षात्कारबुद्धिपर्यन्त की परिणाम परम्परा से अपने आप ही समाप्त ह…
- Verse 13बोध होने के कारण एहिक ओर पारलौकिक कर्मफलों में तृष्णा न रखनेवाले, प्रशान्त इच्छावाले सज्ज…
- Verse 14जिसका चिदात्मा मोहरूप निद्रा से जाग चुका है तथा जिसकी बाह्य वृत्तिर्या निरुद्ध हो चुकी है…
- Verse 15व्युत्थान काल में मन के मनन से युक्त भी (लोक-व्यवहारमें तत्पर भी) ज्ञानी पुरुष विषयों मे…
- Verse 16उस योगी को व्युत्थान काल में विश्वरूपनामक ओर अन्यत्र (समाधिकाल में) ब्रह्मनामक सृष्टि-असृ…
- Verse 17जो योगी समाधि से व्युत्थित तथा समाधिस्थ होकर अभिन्नबोधरूप सद्रूपस्वरूपानुभव में ही स्थित…
- Verse 18जैसे आकाश की शून्य से अतिरिक्त दूसरी वास्तविकता नहीं है वैसे ही जगत् के समस्त पदार्थो की…
- Verse 19अन्य सत्ता क्यो नहीं है ऐसा यदि कहो तो तत्त्वसाक्षात्कार से जगद्रूप का वाध होने पर चिन्मा…
- Verse 20अखण्डार्थक वाक्यलक्ष्यता की विश्रान्ति होने पर यानी अखण्डार्थक वाक्यलक्ष्यत्व -रूप से स्थ…
- Verse 21जो सत्तासामान्य की पराकाष्ठा (परम अवधि) शोधित तत्पदार्थरूपा है वही बोध की भी शोधित त्वम्प…
- Verse 22निर्वाण के लिए, वैराग्य के लिए तथा निर्मल शीतल बोध के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा अन्य…
- Verse 23सब लोगों का सर्वाधिक स्पृहास्पद वस्तुभूत सकलप्रदेश में, सकल काल में, सकल वस्तु रूप से उदि…
- Verse 24संसार निरतिशय दुःखरूप है ओर निर्वाण आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप हे । अतिशीतल निर्वाण ही अस्…
- Verse 25जैसे शिल्पी की बुद्धि में न गढी हुई शिला के भीतर स्थित प्रतिमाएँ यथेष्ट रूप से स्फुरित हो…
- Verses 26–28जैसे जलाशय में स्थित लहरियाँ स्फुरित होती है वैसे ही महाचिति स्वयं अन्नमयादिकोश में स्थित…
- Verse 29जैसे स्वप्न में अपने बन्धुबान्धव के मरने अथवा जीने पर भी स्वप्न से जागे हुए पुरुष की स्वप…
- Verse 30जो दृश्य, द्रष्टा ओर दर्शन त्रिपुटीरूप है वह सबका सब शान्त शिव सन्मात्रही है ऐसी भीतर भाव…
- Verse 31ज्ञान होने पर किस क्रम से भ्रान्ति का अनुद्भव होता है । इस प्रश्न पर उसे कहते हैं। भगवन्…
- Verses 32–33वेराम्य से बोध की अभिवृद्धि होती है ओर बोध से वैराम्य की वृद्धि होती है । बोध ओर वैराग्य…
- Verse 34वैराग्य होना ही बोध की बोधता (सार्थकता) हे । वह पंडिताई केवल मूर्खता ही है जिसमें विरक्ति…
- Verses 35–36जो वैराग्य और बोध पूर्ण होने पर भी परस्पर से वर्धित न हों वे असत्य ही हैँ । चित्रलिखित अग…
- Verse 37बोध ओर वैराग्य के परस्पर से परिवर्धित होने के कारण मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, ऐसा कहते है।…
- Verse 38आत्मा में रमण करनेवाले शान्त, निर्वासनिक, अहंकारशून्य ज्ञानी पुरुष की आकाश की निर्मल स्थि…
- Verses 39–42प्रयत्न कर रहे कई हजार लोगों में से कोई विरला ही बलवान् उत्साही पुरुष जैसे शेर लोहे के प…
- Verses 43–70पूर्ववर्णित वासनाविहीन भाव के उदित होने पर ओर सकल जगत् ब्रह्म ही है यों ज्ञान होने पर एक…