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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 39–42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verses 39–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 39-42

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

प्रयत्न कर रहे कई हजार लोगों में से कोई विरला ही बलवान्‌ उत्साही पुरुष जैसे शेर लोहे के पिंजडे को तोड़ डालता हे वैसे ही वासनाजाल के टुकड़े टुकड़े कर डालता हे । जैसे शरत्‌ में जो कुहरा जिसे सूर्य आदि का बोध हो गया जिसके भीतर तक प्रकाश पड़ चुका वह अपने आप विलीन हो जाता हे वैसे ही वह ज्ञानी पुरुष जिसे पूर्णतया आत्मज्ञान प्राप्त हो चुका, ज्ञान से जिसका हृदय देदीप्यमान हो चुका वह अपने आप शान्तहो जाता है । जिसको ज्ञातव्य सद्‌ वस्तु का ज्ञान हो चुका, संकल्प-विकल्प जिसके मन में नहीं उठते तथा जिसका हृदय संकल्पो का अतिक्रमण कर चुका ऐसा वासनाविहीन महात्मा पुरुष लोकव्यवहार मेँ वायु की तरह चेष्टा करता है अथवा व्यवहार नहीं करता यानी समाधि में ही विश्राम लेता है । तत्त्व के मनन से स्थिर हुए भ्रान्तिमात्र के निश्चय से (ये केवल भ्रमरूप हैं इस प्रकार के दृढ निश्चय से) जो सब वस्तुओं में शून्यताबुद्धि है, वही निर्वासनिक स्थिति हे