Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
असंलग्न होकर रहती हैं, क्योकि वे सब जीवसृष्टियाँ इस प्रकार के निरवयव ब्रह्म में तादात्म्यअध्यास
से आत्माकृत हैं (परम सूक्ष्म बनाई गई हैँ) । अपने स्वरूप में किसी की अनवकाशता अथवा अवरोध
नहीं हे । जैसे सूक्ष्मतम विभिन्न रत्नों की किरणें एक घर में मिलकर भी अलग अगल रहती हैँ वैसे ही
ब्रह्म में जीवसृष्टियाँ भी अलग अलग स्थित हैं, यह भाव है